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सोमवार, अगस्त 24, 2015

जो लोग जीवन या विचारधारा को एक पक्षीय देखते हैं, वे विजय बहादुर सिंह के साथ नहीं रह सकते


                                                                                                             रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति


जिनसे हम ताकत लेते हैं और इतना संजो लेते हैं कि वह आपको सालों या जीवनभर तक काम में आए, उन पर कुछ भी लिखना तलवार की धार पर चलना या किसी अपरिचित से संतुलन को सहेजने की तरह होता है। मैं नहीं जानता कि विजय बहादुर सिंह मेरे लिए क्या हैं, लेकिन जो हैं वह एक अव्यक्त और अपरिभाषित छांव हैं जहां उनके विचार पत्तों की तरह मेरे आसपास बिखरे होते हैं। जब भी कहीं होता हूं और जीवन का कोई न कोई पक्ष, सर के मार्फत उस स्थिति, या उस परिवेश में झलक रहा होता है। विजय बहादुर सिंह इसी तरह मेरे लिए परिभाषित होते हैं। हर जगह हर परिस्थिति में। मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा कि उनसे नियमित मिला जाए। कई बार न मिल कर में उनके बीच में अधिक होता हूं। पिछले एक साल से यह स्थिति बनी है। कई बार मैं उनसे मिलने जाता हूं और डिपो चौराहे से यूटर्न लेकर वापस आॅफिस में बैठ जाता हूं।
आज में सोचता हूं कि विजय बहादुर सिंह सर से एक सीखा हुआ समय मैं किस प्रकार जी रहा हूं। मुझे जो मिलता उनसे, उसमें जिंदगी का हर पक्ष समाहित होता है। वह चाहे विचार हों, चाहे पक्ष या विपक्ष हो, समाज हो, परंपराएं हों या फिर लेखन हो, आज विजय बहादुर सिंह सब तरह से मेरे लिए एक व्यक्तित्व से अधिक पूरा परिवेश हैं। यहां परिवेश के रूप में वे जीवन के तमाम अनुशासन सिखाते हुए साथ होते हैं।
मेरा और विजय बहादुर सिंह का रिश्ता किसी शब्दिक परंपरा से परिभाषित नहीं होता, मेरा और उनका साथ होना एक दृष्टिकोण का निर्माण करता है।
आज मुझे लगता है कि मैं आज भी उनके साथ कई रूपों में साथ हूं। यह महसूस होना किसी भी संवाद के लिए एक जरूरी अनुशासन है।
विजय बहादुर सिंह मेरे दृष्टिकोण का निर्माण करने वाली प्रक्रिया के अभिभावक हैं। वे आलोचक अधिक हैं और मैं कवि अधिक हूं। कविता को समझने के प्रारंभिक दिनों में शब्द और अर्थ की कई परतें मैंने देखी हैं। कई साक्षात्कार किए हैं।
सर के लिए अनिवार्य शर्त है जिसे जीना है। अच्छे से जीना है। उनके लिए किसी की वैचारिक स्तर पर आलोचना करना, किसी के फरेब को नष्ट करना या उस पर हमला करना एक जरूरी प्रक्रिया है। वे मानवीय स्तर पर कुछ और सोच सकते हैं लेकिन वैचारिक स्तर पर हर किसी कवि या लेखक को नहीं बख्शते हैं। कविता पहचानने और उसमें निहित फरेब को पहचाना मैंने सर से सीखता रहा हूं।
क्योंकि वे कहते हैं कि आखिर चीजें एक परतीय नहीं होतीं। उनमें कई परतें होती हैं। इस निष्पत्ति के अनुसार कोई भी चीज एक पक्षीय नहीं हो सकती। इसमें विचार भी शामिल हैं। इस एक बात में हमारे कई दर्शन समाहित होते हैं। विजय बहादुर सिंह ने मेरे लिए लंबी यात्राएं रखीं।
मैं उनके कारण ही विविधता में चीजों को, विचारों और विचारधाराओं को देखना सीखा। जो लोग जीवन या विचारधारा को एक पक्षीय देखते हैं, वे विजय बहादुर सिंह के साथ नहीं रह सकते। क्यों? इसका कारण है वे आपकी चेतना को झकझोरते हैं, और यह बहुत कम लोगों को पसंद आता है। कई लोग बड़ी रुचि से मिलने जाते हैं और लौटते समय कहते हैं कि अरे विजय बहादुर सिंह तो बहुत मुश्किल व्यक्ति हैं। क्या मुश्किल हैं? क्योंकि वे आपके जड़ विचारों को हिला देते हैं।
ऐसा ही एक बार का उदाहरण है। दो युवा भोपाल से मिलने पहुंचे। उनमें से एक सरकारी इंजीनियर हो चुके थे और एक किसी आॅफिस में अधिकारी। दोनों साहित्य कविता में रुचि के चलते मिलने आए थे। विदिशा में विजय बहादुर वाली गली के उस घर में प्रवेश करते ही उनको अपने जूते उतारना पड़े। फिर मूंग की दाल, विदिशा वाला नमकीन और पुदीना वाली चने की दाल रिंगे ने उनकेसामने रखी। बहुत देर तक बातें होती रहीं। सर ने स्पष्ट कर दिया था कि मैं अभी कुछ नहीं खा सकता। वे इससे प्रभावित थे कि इतना स्वादिष्ट नमकीन में से डाक साहब कुछ नहीं खा रहे।
करीब तीस चालीस मिनट की बात हो चुकी थी। उस बात चीत में नमकीन भी खत्म हो रहा था लेकिन इतना खत्म नहीं हो पा रहा था कि प्लेटें साफ हो जाएं। उनमें जो नमकीन बचा है उसे पूरा खा लिया जाए। लेकिन उन युवाओं को लग रहा होगा कि प्लेटें पौंछ कर खा लीं तो अशिष्टता, और दूसरी तरफ सर को लग रहा था कि एक चम्मच नमकीन, दाल के कुछ दाने कचरे में फेंकने के लिए छोड़ना श्रम की कीमत का अपमान। बनाने वाले मजदूर की मेहनत का अपमान। अन्न का अपमान आदि।
उस समय मैं, श्रीकांत रिंगे और शैलेंद्र भावसार वहां थे। हम सर के सामने इन सब चरणों से निकल आए थे लेकिन वे दोनों युवा शिष्ट अधिकारी शायद अपने जीवन का, विजय बहादुर सिंह के सानिध्य में पहला चरण पार करने वाले थे।
बातचीत खत्म हो गई।
कुछ देर पहले जो बातचीत की जा रही थी उसमें कहा जा रहा था कि किसानों की समस्या क्या है? मजदूरों की समस्या क्या है? श्रम और पैसे का बंटबारा इतना असंगत क्यों होता जा रहा है।
उस समय किसानों और मजदूरों की बातें इस तरह होती थीं। आज तो इस तरह की बात करना आवश्यक नहीं समझा जाता, क्योंकि चमक-दमक में मजदूरों को सजा दिया गया है। कंपनी उनको ड्रेस देती है। बस अब लाखों करोड़ों युवाओं को 10 से बारह घंटे वातानुकूलित शो रूम अथवा मॉल में खड़े खड़े गुजारना होते हैं। या लाखों गार्ड दरवाजे पर   नीली-काली ड्रेस और टोप लगा कर खड़े रहते हैं। ये वो खेतीहर मजदूर हैं जो गांवों में ट्रैक्टर, थ्रेशर, हार्वेस्टर आने से बेरोजगार हुए। खेतों और खलिहानों से मानवीय श्रम  सिमट गया। खेतों की कटनई खत्म हो गई और वे सब शहर आ गए। आज उनको ही यहां खड़े रह कर प्रोडक्ट बेचना होते हैं। उनको महीने में मिलता है साढ़े पांच हजार, सात हजार या नौ हजार, किसी किसी को तेरह भी मिल जाता लेकिन किसी किसी को।
ये सजे धजे लाखों करोड़ों लड़के लड़कियां, मजदूरों, शोषित किसानों के समान ही हैं। इनके चेहरे कुपोषण से पिचके होते हैं। इनके चेहरे पर कोई भाव नहीं, बस एक रोबोट की तरह शो रूमों में, बड़ी दुकानों में, मॉल और स्टोरों में व्यस्त हैं।
ये सब शहर की झुग्गियों में रहते हैं। किसी सुविधाविहीन बस्ती के किसी मकान के एक कमरे में पांच लोग शेयर करके रहते हैं। उनको श्रम का पूरा हक नहीं मिलता।
कौन जिम्मेदार है? मध्यवर्ग को सपोर्ट करने वाली सरकारी नीतियां? लिजलिजे नीतिनिर्माता, जनप्रतिनिधि और सुरक्षित शोषण में लिप्त उच्च अधिकारी। शहरों में गांवों से आने वाले इस तरह के युवाओं का सिलसिला उस समय शुरु ही हुआ था लेकिन आज गांव शहरों की तरफ बाढ़ की तरफ आ रहा है और दूसरी तरफ देश का मध्यवर्ग सबसे लिजलिजे स्वरूप में फैल रहा है। नौकरीपेशा और व्यापार धंधे में मस्त इस वर्ग को देश की कोई चिंता नहीं है। यह समस्याओं पर बहुत गंभीरता से विचार नहीं करता। यह पूरा वर्ग भेड़चाल में यकीन करता है। एक सुरक्षित और खोल में बंद जीवन बिताता है। आदि आदि। गांव के ये युवा कुछ सालों बाद मध्यवर्ग के रूप में जड़ों से कटे हुए एक परिवार के रूप में शहर की सबसे पिछड़ी बस्ती का हिस्सा हो जाता है।
इस लंबी बातचीत का अंत अभी बाकी है।
दोनों युवा अधिकारी जाने के लिए तत्पर हो रहे थे। फिर आपसे मिलेंगे, हम आपको रचनाएं दिखाएंगे जैसे अंतिम चरण के संवाद कर रहे थे।
तभी सर की नजर उन प्लेटों पर पड़ी। करीब चार चम्मच नमकीन बचा होगा। उसमें अंकुरित मूंग भी थी। सर ने उनसे पूछा- क्या आप दोनों को श्रम के सम्मान का अर्थ पता है? वो एक दम हक्का बक्का और उठते-उठते बैठ गए। कुछ क्षण के बाद झिझकते  हुए  उन्होंने कहा-‘ नहीं डाक साब।’
ये जो आप प्लेट में नमकीन छोड़ कर जा रहे हैं। वह कचरे में चला जाएगा। क्या कोई किसान इतना अन्न इस तरह प्लेट में छोड़ सकता है? वह जानता है कि उसका एक दाना कितने श्रम से पैदा होता है। कितनी मेहनत के बाद वह खाने लायक का सृजन कर पाता है। इसीलिए किसानों को देखिए एक एक दाना बीनता है। हम इस तरह इसलिए छोड़ देते हैं कि हम उसके श्रम की पूरी कीमत नहीं चुकाते।
आपको ये सब पूरा खाना चाहिए। एक प्लेट को मैंने उठा कर, उसकी अंकुरित मूंग के कुछ दाने हथेली पर रख कर खा लिए। इसके बाद दोनों ने आहिस्ता से चम्मच से नमकीन के संपूर्ण कणों को सहेज लिया। बात जाने की हुई। दोनों उठे और सर की और पांव लागू करने लगे। फिर जूते पहने और दरवाजे के बाहर खड़े होकर कुछ और बातचीत।
मैं भी उनके ही साथ अपने रुम पर बाहर जाने के लिए बाहर निकल लिया। मैं सर से जाने के लिए नहीं पूछता था। मैं उनकी आंखों में देखता और वे मेरी बॉडीलैंग्वेज से समझ जाते थे कि अब मुझे जाना है। वे या तो बोलते ठीक है तुम जाओ। जो बातें हुई हैं उन पर विचार करना। या फिर सिर हिला देते, उसका मतलब भी यही होता ठीक है जाओ।
 मैं उनके पीछे गली के मोड़ पर आ गया था। वे आपस में बतिया रहे थे, साला ये कोई बात है प्लेटें खाली करवा लीं। ये तो इंसल्ट है। उन्होंने मुझे देखा और फिर वे दूर चले गए।
सर ने मुझसे आज तक नहीं पूछा कि वे बाद में क्या कह रहे थे और न मैंने कभी इसकी चर्चा की। मैंने उनको कभी फिर सर के यहां नहीं देखा।
सर का यह जो शिक्षण है, यह कमाल का है। बार बार सर के घर या उनसे मिलने वालों ने ऐसे कई चरण पार किए हैं।

रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति
101, आरएमपी नगर, फेस- 1, विदिशा मप्र
9826782660


बुधवार, जून 11, 2014

भोपाल का बड़ा ताल




भोपाल का बड़ा ताल । शाम का सिंदूरी सूरज ताल के भाल पर चमक रहा था जैसे कि राजा भोज तिलक लगा कर उस तरफ खड़े हैं। ताल की लहरें शाम की धूप की लाल  झीनी भीनी साड़ी पहने थीं। लहरें ऐसी चमक रही थीं जैसे उसकी चूनर चमकीली किनार हो।
मैं कई सालों बाद भोपाल आया था और घर आने के बाद सबसे पहला ख्याल आया ताल  के किनारों पर कुछ पल बिताऊं। यहां पहुंच कर मुझे अपने पिता के करीब होने जैसा अहसास हुआ। जैसे ये किनारे मेरे पिता की अंगुली है। सच वह कुर्सी जिस पर मैं कभी बैठता था आज भी वहीं थी बस उसका रंग बदल गया था। उस कुर्सी पर बैठ कर मैं सोचा करता था कि ताल  मेरा दोस्त भी है और मेरा पिता भी। उसके किनारे पर मेरे मन में कई ख्याल आते थे।
....
कई बार ताल  में तैरती नाव देख कर लगता था कोई विचार इस ताल  में तैर रहा है। सच कहूं तो मुझे ताल  ने अपना सब कुछ दिया। जीवन की लहरों से लड़ने की ताकत ताल  की लगातार उठती लहरें दे रही थीं।
 इसके किनारों पर जलते विदग्ध हृदयों को शीतलता देने वाले हवा के झोंकों में रखी ठंडक राहत देती है। प्यार देती है उस आग को सहन करने वाली। ताल  के ये किनार कई बार आंसुओं से भीगे हैं। इन आंसुओं में कई कहानियां हैं जो यहीं इन किनारों में दफन हैं। कहीं वादा किया किसी ने तो कहीं बदलते वक्त के साथ सिर्फ दोस्ती है कमिटमेंट नहीं। हम प्यार करेंगे और करते रहेंगे जब तक चलता रहेगा। फिर किसी दिन आके यहीं तोड़ देंगे वह कसम जो किसी गांठ की तरह हमने बांधी थी।
आज में कई सालों बाद भोपाल की ताल  पर टहल रहा हूं। बहुत कुछ इसके किनारों को बदल दिया है। पक्के कर दिए हैं। पर वो पत्थरों पर बैठ कर पानी को झूले की अभिलाषा यहां पूरी नहीं होती। पानी के करीब रहने का अहसास इंसान की आदिम भूख रही है। शायद इंसानी सभ्यता और आदिम जमाने में भी इंसान को पानी  चाहिए होता था। सच में यह ताल भी जब बनाया गया होगा तो यही सोच कर कि इंसान पानी के करीब रहेगा। भोपाल के इस ताल को मैं अपने दिल में वैसे ही दर्ज करता हूं जैसे आंखों में पिता की यादें।
अब यहां इस ताल पर वैसी शांति नहीं है। लोगों की भीड़ शाम को बहुत बढ़ जाती है। मुझे लगता है कि इस भीड़ में हम भी हैं। ये सारे चेहरे ताल  के किनारे अपने अपने होने का अर्थ खोजते हैं।
मुझे बढ़ती भीड़ कई बार परेशान करती लेकिन मैंने इस भीड़ में भी अब ताल  के साथ रहना सीख लिया है। आइए आप भी सभ्यता के हजारों साल पुराने इस ताल  से  दोस्ती कर सकते हैं। बस उसके किनारों पर जाना होगा।

सोमवार, अप्रैल 14, 2014

भारतीय होना ‘वाइड’ होना है

 

मनोज श्रीवास्तव
विचारक एवं कवि 
यह साक्षात्कार करीब तीन साल पहले लिया गया था ब्लॉग पर आज  प्रस्तुत है।

लिखने की क्या प्रेरणाएं रही हैं?
मैं जिस तरह की दुनिया में हूं, वहां बहुत तरह की साजिशें हैं। कोई अपने कर्तव्य में कितना ही दत्तचित हो, लेकिन कुछ लोग उसके खिलाफ षड्यंत्रों की एक विकृत मन:स्थिति में रहते ही हैं। उन सबके बीच लिखने में जिंदगी की अनिश्चितताओं और अवसादों को जैसे एक आश्वस्ति सी मिलती है, लगभग वैसी ही जैसे कुछ भाग्यशाली लोगों को मेडीटेशन में मिलती है। जब आप लोगो की हिट लिस्ट में हों, यह जानकर अच्छा लगता है कि आपने किसी नए आइडिया को हिट किया है। जब वे अपनी संकीर्णताओं में ही रमे हैं, आपकी रचना आपको अर्थवत्ता की और आल्टीट्यूड्स तक ले गई है। रचना रति नहीं है, मुक्ति है। जब लोग शब्द का व्यापार कर रहे हों, जब शब्द तक पैक हो रहा हो- तब रचना का शब्द अचानक जैसे खेल-खेल में बिना किसी मोल-तोल के आप तक आ पहुंचता है, मन जैसे धन्यता के एक भाव से भर जाता है। रचना में ‘चांस’ का जो एक अनुतत्व है, वह किसी आशीष-सा लगता है। जहां पैकेज न मिलने पर शब्द भी चरित्र हत्या पर उतारू हो जाता हो, वहां शब्द की वह सारस्वत सत्ता देखना है कि वह समकक्ष सृष्टि-सा लगे, द्वितीय निर्मिति-सा लगे, एक अलग की कृतार्थता है। तात्कालिक की क्षुद्रताओं के पार जैसे कहीं लगातार ढांढस बंधाते हुए, लगातार सम्बल देते हुए, एक सनातन का उजास-सा है। लिखना जितना कोई चीज पैदा होना है, उतना ही कोई खोजना भी है। जब हम कविता लिखते हैं, तो कला को नहीं चुन रहे होते हैं। जीवन जीने की एक खास शैली को चुन रहे होते हैं।

 बहुत ‘वाइड रेंज’ है, यह कैसे हासिल किया करते रहे हैं?
रेंज का बहुत विस्तृत होना कम से कम मेरे लिए तो मेरे अपने प्रोफेशन का नतीजा है, जो किसी व्यक्ति को भिन्न-भिन्न भूमिकाओं में रखता है। मनुष्य समाज और परिस्थितियों के जितने ज्यादा आयाम इसमें दिखाई पड़ते हैं, वे तो किसी यायावर को ही उपलब्ध होते होंगे। दूसरे संभवत: भारतीय होना ही व्यापक रेंज का होना है। यह देश है ही विविधता का। दृष्टि जो व्यापकत्व भारत में है, वह न तो हिटलर को नसीब हुआ और न मुसोलिनी को, न लेनिन को और न माओ को, न गद्दाफी को और न सद्दाम हुसैन को। भारतीय होना ‘वाइड’ होना है।

 लिखने में व्यस्तता के बाद भी इतनी निरंतरता, यह किस स्तर पर मैनेज करते हैं, यह कैसे संभव बनाते हैं?
लिखना जितना इल्युमिनेशन है- चमकना है, उतना ही वह कहीं इंक्युबेशन भी है। कुछ भीतर ही भीतर पकता-सा रहता है। लोगों का ध्यान उस ‘चमकने’ पर जाता है और वे उसे ही रचना कहते हैं- लेकिन थोड़ा तवज्जो इस ‘पकने’ पर दें। हो सकता है, यह फल का पकना न हो, घाव का पकना हो। ‘दुनिया ने तजुर्बातो- हवादिस की शकल में/ जो कुछ दिया है मुझे वही लौटा रहा हूं मैं। इसलिए व्यस्तता निरन्तरता की दुश्मन नहीं है। व्यस्तता निरंतरता को मुमकिन बनाती है। यदि लिखना सिर्फ एक फ्लैश है, तब तो उसमें वक्त लगता ही नहीं है। लेकिन यदि लिखना अनुभवों का परिपाक है, तो वह इस व्यस्तता के कारण ही संभव हो पाता है। हर तरह के लोग मिलते हैं, देवता भी कि जिनके पास जाकर मन को मलिनता भी काई की तरह छंट जाती है और वे भी जो किसी दूसरे को उठता हुआ देखना बर्दाश्त ही नहीं कर पाते। लिखना इन तरह-तरह के तजुर्बों के बीच किसी तरह की व्यवस्था या ‘आर्डर’ ढूंढने की कोशिश है।
लेकिन हो सरकता है कि यह खुद अपने आप में ‘डिस्आर्डर’ हो, व्याधि हो, रोग- सा हो लगा हुआ। एलिस फ्लाहर्टी ने जिसे ‘मिडनाइट डिसीज’ कहा है: ‘मध्यरात्रि की बीमारी’। कई बार जब मैं देर से सोने के बावजूद बीच रात में उठकर लिखने बैठ जाता हूं तो यह बात सच भी लगने लगती है। तो एक तरफ वर्कोहलिज्म और दूसरी तरफ लिखने की यह असाध्य बीमारी जिसे हाइपरग्राफिया कहते हैं। यह आदमी तो गया काम से। ये तो क्रॉनिक बीमारियों से ग्रस्त है। लेकिन बीमारियां बस इतनी ही। एजरा पाउंड की तरह स्किजोफ्रेनिया नहीं, राबर्ट लुई स्टीवेंसन की तरह कौकेन लेकर लिखना नहीं, कॉलरिज की तरह मैनिक डिप्रेशन नहीं, गुस्ताब फ्लाबेर की तरह मिर्गी नहीं। उन सबने असाधारण बीमारियों के साथ असाधारण कुछ लिखा। लेकिन जहां लिखने को ही बीमारी समझा जाए, वह समाज स्वयं कितना बीमार हो गया है, यह कौन पता लगाएगा।

 कई बार लगता है लेखन आपके सोच का भी विस्तार है, ऐसे में अपनी रचना प्रक्रिया  बताएं?
जिसे विशेषज्ञता कहा जाता है, उस अर्थ में दर्शन- शास्त्र या विचारणा का अध्ययन मेरा नहीं है। यह तो क्षेत्रज्ञ लोगों का काम है। क्षेत्र के क्षेत्रपों का। मैं न तो धर्म और अध्यात्म के ‘डॉमेन’ में कोई विशेषज्ञ गति रखता हूं, न ‘लॉजिक’ के। बल्कि साहित्य या आलोचना को भी ‘स्वत्व’ के भाव से नहीं देख पाता। वहां तो इतने जमींदार हो गये हैं कि मेरी हैसियत भूमिहीन मजदूर जैसी है। आई.ए.एस. हो जाना लेखन की इस दुनिया में जर्बदस्त परायापन पैदा करता है। हालांकि जितने भी आई.ए.एस. लेखक हुए हैं, वे पहले लेखक थे और बाद में आई.ए.एस. बने। प्राय: सभी ने उस बचपन में लिखना शुरू किया जिस पर सभी का समान हक होता है। लेकिन आई.ए,एस. में आते ही वे ‘‘हैव्स’’ में शुमार कर दिये गये। उसका   प्रतिशोध उसे साहित्य में भूमिहीन मजदूर बनाकर ले लिया जाता है। कई लोग इसी दूसरपन से उबरने के लिए रचना के स्तर पर कॉमरेड हो जाते हैं अऔर एक जमींदारी के नागरिक बन जाते हैं। मैं अनागरिक ही रहा। किसी खेमेमें शमिल होा या कोई खेमा खड़ा करना दोनों में ही मेरी अरुचि थी। शिविरों में चिंतन-कक्ष होते हैं और वे वहां चिंतन- मनन करते भी होंगे। लेकिन मुझे लगता रहा कि चिंतन से कहीं अलग एक चिन्ता भी है जो हमें जिंदगी के मायने समझने का मौका देने के लिए एक दरवाजा भी खोलती है। उस चिंता में लगता है कि कुछ लिखे जाने की जरूरत है।  लोग चिन्ता को साइकोथिरेपी से जोड़ते हैं, मैंने लेखन से जोड़ा। शिविरों के चिंतन-कक्ष में दूसरे से युद्ध की रणनीति बनती है, लेकिन रचना तो बहुत हद तक अरण्य में छूट जाने का साहस है।

 सामाजिक संदर्भों पर भी आप काफी गौर करते हैं, ये कैसे... आपकी विचार-प्रक्रिया का स्रोत- बिन्दु क्या है...?
ये सामाजिक संदर्भ अपने किस्म का अरण्य है। अरण्य कोई पिछले जमाने की प्रकृति की क्रोड़ नहीं जिसमें ऋषियों की ऋचाएं संपन्न हुर्इं। यह जंगल तो जैसे प्रतिदिन हम पर हल्ला बोलता है। यह जंगल किसी तरह का असमाप्त शून्य नहीं है। यह तो कांक्रीट का जंगल है। यहां सियारों की आवाजें भी हैं और गीदड़ों की भी। यह अरण्य औपनिवेशिक लेखकों के द्वारा कार्बनाइज्ड जंगल है। कैसा- कैसी घात लगाकर यहां भारतीय आत्मविश्वास का शिकार किया गया है, किया जा रहा है। बात इसकी नहीं है कि दुनिया भारतीय और गैर- भारतीय के बाइनरी भेदों में बांटी जा सकती है। बात इसकी है कि शिकार कौन है, तीर किसे लग रहे हैं, खून किसका बह रहा है और आप शिकारी के साथ क्यों हैं?


 कई बार आप (कई रचनाओं में) जवाब दे रहे होते हैं। ऐसा किस कारण से होता है?
एक न एक दिन तो उन्हें जवाब मिलना ही था। मंैने जवाब न दिया होता, किसी और ने दिया होता। एकतरफा ट्रेफिक था। एकांगी मार्ग। जैसे कि भारतीय मनीषा सिर्फ झेलने के लिये ही बनी हो। मैंने पशुपति, वंदेमातरम्, कुरान, शक्ति, तुलसी, हनुमान आदि पर लिखा है क्योंकि इन सबके खिलाफ औपनिवेशिक और उलटपंथी लेखकों ने क्या- क्या नहीं कहा? ‘सेक्रेड’ को पवित्र को अतिक्रमित करना, अपने तरह का शौर्य हो सकता है, लेकिन जब वह चयन करके हो तब क्या। बकरा बुद्धि के लोग जब हमारे देश की प्रतिष्ठा- पुस्तकों को गड़रियों के गीत बतलायें और हमारे थाती- पुरूषों को कवि- कल्पना, तो उन्हें अनुत्तरित क्यों जाने दिया जाये? इतिहास सिर्फ वही सवाल नहीं करेगा जो हमारे विद्वान इतिहासकार करते हैं, वह उस तरह के सवाल भी करेगा जो उनकी विद्वता के बावजूद नहीं किये जा रहे।
( साक्षात्कार : मनोज श्रीवास्तव से रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति)

बुधवार, जनवरी 01, 2014

प्रताड़ना के आरोप :कई सवाल

  ज ब भी किसी बड़ सभ्रांत वर्ग के व्यक्ति पर रेप या यौन प्रताड़ना के आरोप लगते हैं तो कई सवाल भी सामने आ खड़े होते हैं। हाल ही में गिरीश वर्मा पर एक महिला ने रेप का आरोप लगाया है। ऐसे कई मामले वर्षों पुराने होते है तो कुछ एक नए। रेप और यौनप्रताड़ना को लेकर समाज में शिकायतों की संख्या बड़ी है अथवा रेप की संख्या बड़ी है। दोनों पक्ष गौर से देखने पर यह लगता है कि  महिलाओं ने रेप जैसे अपराध करने वाले अपराधी से प्रतिकार की क्षमता हासिल की है। इसमें कानून की सुरक्षा तो है ही त्वरित कार्यवाही से भी शिकायतों का प्रतिशत बढ़ा है। राजनीति और सामाजिक ताकत के गठजोड़ ने इस तरह के अपराधों का जन्म होता है। यह एक सामाजिक समस्या के साथ, ताकत के दुरुपयोग की समस्या है। स्त्रियों के प्रति दृष्टिकोण का भी मामला है। हालांकि रेप के लेकर कई तरह की रिसर्च भी हुए हैं जिनमें पाया गया है कि यह मात्र कानून से नियंत्रित की जाने वाली समस्या नहीं है। इसमें सामाजिक सोच और अनियंत्रित कामेच्छा दोनों शामिल हैं, जो किसी पल विशेष में इंसान के दिमाग पर जबर्दस्त तरीके से हावी हो जाती है। इसी अनियंत्रित कामेच्छा को संतुष्ट करने के लिए वह रेप जैसी हिंसा की ओर कदम बढ़ा देता है। लेकिन इस मामले में हुई तमाम रिसर्च इस बात को प्रमाणित करती नजर आती हैं कि एक रेपिस्ट के मस्तिष्क में होने वाली मनोवैज्ञानिक उथल-पुथल में सेक्शुअल डिजायर से ज्यादा महिला पर हावी होने और उसे कष्ट में देखने की चाह होती है और इसे पूरा करने के लिए ऐसे लोग सेक्स को माध्यम बनाता है। सेक्स करने की सामान्य और सहज प्राकृतिक इच्छा इस काम में गौण हो जाती है। रेप आधुनिक सभ्यता के प्रति अपराध है।
किसी रेपिस्ट की सोच, उसके दिमाग के काम करने का तरीका और आगे बढ़कर अपनी इस घिनौनी सोच को अंजाम तक पहुंचा देने की पूरी प्रक्रिया में मानव सेक्शुअलिटी सबसे काला पक्ष है। तमाम विशेषज्ञ बरसों से उन मनोवैज्ञानिक ताकतों और दबावों को जानने-समझने की कोशिश करते रहे हैं, जो किसी इंसान को रेप जैसे अपराध के लिए प्रेरित करते हैं। शोधों में रेपिस्ट के मस्तिष्क को पढ़ने के लिए बहुत समय पहले कनाडा में एक रिसर्च की गई, जिसमें महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रही सोच ही प्रमुख थी। प्रमुख रूप से महिलाओं के प्रति सैडिस्ट अप्रोच। रेप की घटनाओं को अंजाम देने से पहले ऐसे लोग ज्यादातर नशे में पाए गए हैं। महिलाओं को लेकर वे पूर्वाग्रहों से ग्रस्त भी थे। महिलाओं के प्रति उनके मन में इज्जत के भाव नहीं थे। कई बार ये सामान्य लोगों में उनकी सामाजिक आर्थिक हैसियत से भी यौन प्रताड़ना का जन्म होता है। दूसरी तरफ यह भी सच है कि कुछ मामले बदले की भावना से भी लगाए जाते रहे हैं। सहमति से सेक्स को बलात्कार का रूप देना, किसी के द्वारा देखने के बाद सार्वजनिक होने के डर से भी ऐसे मामले सामने आते रहे हैं। वास्तव में इस बारे में अधिक वस्तुनिष्ठ होने की आवश्यकता है। महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों का प्रतिकार अब सामाजिक परिवर्तन का हिस्सा हो चुका है। समाज को यह स्वीकार करना होगा।

बुधवार, अक्टूबर 09, 2013

तो फिर युद्ध कौन करता है 12

 
दोस्तो

कुछ कविताएं आपके लिए कुछ पुरानी हैं कुछ नई हैं। यह एक कवि गोष्ठी में पढ़ने के लिए चयनित की थीं। सोचा बंच में आपसे भी शेयर की जाएं। आपकी खरी प्रतिक्रिया का इंतजार है...
चलते चलते

चलते चलते रुकते रुकते
सफर ये तेरा पूरा हो

टूट के गिरता बादल पानी
बहता दरिया पूरा हो

महक रही है धूप सुनहरी
दिन ये तेरा पूरा हो

खिड़की में मुस्कान रखी है
घर ये तेरा पूरा हो

तेल मसाले कम और ज्यादा
छौंक तो तेरा पूरा हो

कार के आगे उड़ती तितली
जंगल तेरा पूरा हो

सड़कें जलती आग सरीखी
एसी तेरा पूरा हो

महीना निकले या अटके लेकिन
वेतन तेरा पूरा हो



 पूरा दिन




दिन ने मुझे इस कदर काम पे लगाया
मैं भाग के रात की गोद में छुप गया

सुबह पिता की अंगुली थी
पकड़ के बचपन गुजर गया

भागता हुआ जाता है दिन का छोर
मेरे हिस्से में रह जाती है थकावट भरी शाम

काम का पूरा दिन सिर पर खड़ा रहता है
बाजारों की भागदौड़ में चमकती दोपहर
मेरी पीठ पर सलीब सी टंग जाती है


मैं खींचता हूं पूरा दिन रोशनी से लहुलुहान
सूरज के घोड़े की तरह मैं दौड़ता हूं दुनिया में



 आजादी

सबसे कठिन है आजाद होने की घोषणा करना
आजाद हो जाना आदमी की सबसे बड़ी जिÞम्मेदारी है


 आजादी  माँगना सबसे बड़े भय का सामना करना है
जब हवाएँ सबको एक तरफÞ ले जा रही हो

प्रयत्नों के तिनके छोड़ कर
लोग खाली हाथों को लहराने लगें
तब कठिन हो जाता है आजÞादी की सीमा बताना
जब गुलामी को आजÞादी बताया जा चुका हो
जÞरूरत होती है ऐसी आजÞादी को पहचानना

अपनी आजादी की घोषणा
दुनिया की सबसे बड़ी कीमत चुकाने की शुरुआत है
ये शुरुआत किसी भी क्षण की जा सकती है
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कीमत

कीमत केवल शर्ट की नहीं होती
समय परिश्रम सीने में रखे ईमान और जीने की इच्छा का
उसमें शामिल होना जÞरूरी है
बहुत कम चीजÞों की कीमत रुपयों में होती है
हम ज़्यादातर चीजÞो की कीमतें अपने होने से चुकाते हैं

हमें भोर की लालिमा के लिए चुकाना होती है
मीठी नींद और बिस्तर की ऊब
चाँद को देखने के लिए शहर से बाहर जाने की कीमत
कार में बैठे कर काँच लगाने और सफÞर करने के लिए
हमें कीमत चुकाना होती है।

नदी के किनारे पर जाने और नहीं जाने के लिए
संगीतकार को सुनने और नहीं सुनने के लिए
चित्रकार के चित्रों को देखने और नहीं देखने के लिए
कविता को सुनने और नहीं सुनने के लिए
काम करने और नहीं करने की कीमत चुकाना होती है
हमें अपने होने के लिए एक एक सांस देना पड़ती है

पेड़ों की छाँव पाने के लिए
हवाओं में लहराने के लिए
धरती पर एक कदम चलने की कीमत चुकाना होती है
संसार में कुछ भी बेशकीमती नहीं है
कुछ भी ऐसा नहीं है जिसको कीमत न दी जा सके
कीमत केवल रुपयों से अदा नहीं होती



तो फिर युद्ध कौन करता है

वे युद्ध नहीं करते वे सिर्फ हाियार बनाते हैं
Ñ
कभी भी हथियार बनाना युद्ध करना नहीं होता?
वे मुनाफा कमा रहे हैं दुनिया भर से
और मुनाफा कमाना युद्ध करना नहीं हो सकता
मैं देखता हूं और मुझे ऐसा कहना पड़ता है

वे आक्रामक विज्ञापन और तूफानी माहौल बनाते हैं
लॉबिंग करते हैं ब्रांड, बाजार और हथियारों की
मैं फिर कहता हूं विज्ञापन करना युद्ध करना नहीं है

वे रिसर्च करते हैं धरती आसमान और आंतरिक्ष में
वे परमाुण से बिजली बनाते हैं और उससे कुछ बल्ब जलाते हैं
वे बांध बनाने के बाद उनके  सूखने के बारे में सोचते हैं

बिजली से बल्ब जलाना और नदियों के बारे में सोचना
युद्ध नहीं हो सकता -मेरा ऐसा कहना जरूरी है
और भी चीजें हैं- वे शांति की बातें करते हैं
हम सभी जानते हैं शांति की बातें युद्ध नहीं हो सकतीं?

वे संसाधनों को अपने हक में लिखते हैं
वे कहीं कब्जा करते हैं कहीं व्यापार का समझौता
कभी धरती से बहुत सा तेल निकाल लेते हैं
धरती से तेल निकालना युद्ध करना कैसे हो सकता है?

परंपराएं, शहर, गांव और जंगल उनके लिए
दुनिया में बाजारों से खाली जगहें हैं
राजधानियों में इन पर सरकारें संधियां करती हैं
वे उनके और हमारे देश को परस्पर नापते-तौलते हैं-
वे अपने साथ कभी  कोई फौजी नहीं लाते
व्यापारियों के अलावा उनके हवाई जहाज में कुछ नहीं होता
व्यापारियों को साथ लाना युद्ध है? इसे कौन युद्ध कहेगा?

मेरे देश परंपराओं को नष्ट करना वहां अपनी चीजें रखना
युद्ध कैसे हो सकता है- युद्ध तो हथियारों से लड़ा जाता है?
इसीलिए मुझे कहना पड़ रहा है कि वे युद्ध नहीं करते

वे शांति के प्र्रस्ताव लाते हैं और शांति से आते हैं
उन्हें पता है अशांति से बाजार डरता है
इसलिए शांति की बात को युद्ध नहीं कहा जा सकता

दुनिया में और भी कई चीजें हैं जो युद्ध नहीं हो सकतीं
जैसे कि फसलों के बीजों को बदल देना
खेती की तकनीक के बारे में और बातें करना
सरकारों को अपने प्रस्तावों के लिए राजी करना
यह सब करना युद्ध कैसे हो सकता है?

विज्ञापन देखकर और अखबारों को पढ़ कर
कभी नहीं समझा जा सकता कोई भी युद्ध
हमारी जगह उनका होना
या हमारे कुछ व्यापारियों का उनकी तरह हो जानाView blog
इस अदल बदल को युद्ध नहीं कहा जा सकता?
सवाल है कि युद्ध किस चीज को कहा जा सकता है?

कोई जानता हैं कि युद्ध क्या है? तो मैं जानना चाहता हूं
ताकि युद्ध के बारे में कुछ सही सही लिखा जा   सके!




   

समय की चादर


अभी समय की चादर को बिछाया है
दिन के तकिए को सिरहाने रखा है
जिÞंदगी का बहुत सा अधबुना हिस्सा यों ही पड़ा है

शहर में किस को मालूम है
अधबुनी जिÞंदगी कितनी कीमत माँगती है
कोई नहीं बताता प्यार के धागों का पता

अपने शहर को प्यार की खुमारी से देखते हुए
एक अजनबी की मुस्कान में मिलते हैं प्यार के धागे
जिÞंदगी ने अपनी मुस्कान को पूरा कर लिया है

आज दिन के तकिए पर सिर रख कर
जिÞंदगी समय के चादर पर सो रही है
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दोस्ती

दोस्तों एक राह पर साथ चलना नहीं होता
ये अहसास का सफÞर है पूरा नहीं होता

दोस्तों किसी बासीपन को लेकर नहीं चलती
इसकी राह में कोई कदम पुराना नहीं होता

दर्द जिसका चाँद-सा हो खुशी समंदर-सी
इसकी दोस्ती से कोई जहाँ बाकी नहीं होता।

जिÞंदगी की नर्सरी में हजÞार रिश्ते हैं
दोस्ती की महक वाला कोई रिश्ता नहीं होता

दर्द से लबरेज दोस्त है वादे मत करो
सामने चुप खड़े रहना कुछ काम नहीं होता



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एक उदास लड़की और मैं

कल मैं ही था उस उदास लड़की के साथ
मैंने ही उसे कहा था-
तुम्हारी उदासियाँ इस मॉल की रोशनियाँ हैं
कुछ क्षण रुक कर उसने कहा-
मैं अपने दोस्त को एक गिफ्ट छू कर आई हूँ
तब मेरी उँगलियों में बहुत उदासी थी
इसीलिए तो सारी लाइटें उदास हो गईं

चलो मैं अपन पर्स देखता हूँ मैं जÞरा-सा हँसा
और तुम भी अपना पर्स देखो
फिर कुछ दिनों तक मॉल की रोशनियाँ
हमारी आँखों में चमकती रहीं थीं



सब जगह तुम

रोजÞ काम से कमरे पर लौटता हूँ
अक्सर शाम तुम आसपास होती हो

मैं एक रंग से भर जाता हूँ
तुम शाम का रंग हो जाती हो
और मुझे शाम का रंग अच्छा लगता है
मेरी आँखों में फूलों की तरह खिलता है

मेरी आँखें फूलों की तरह दुनिया देखती हैं
और तुम सब जगह मुझे दिखाई देती हो।






आधा बिस्किट

तुम्हारे हाथों से तोड़ा आधा बिस्किट
संसार का सबसे खूबसूरत हिस्सा है
जहाँ कहीं भी आधा बिस्किट है

तुम कहाँ-कहाँ रख देती हो अपना प्यार
बिस्किटों में चारा के सुनहरे पन में
पानी के गिलास और विदा की सौंफ में

तुमने कोने कोने में रख दिया है
हर कहीं मिल जाता है तुम्हारा प्यार

नदियों की ये कैसी चिंता

 

नदी प्रदूषण भारत की बड़ी समस्या है। यह प्रतीकात्मक तरीकों से हल नहीं होने वाली। इसके लिए हमें उद्योग और समाज में ऐसे दूरगामी मॉडल की अवश्यकता है जो उन्हें स्वच्छ रख सके।


अ   खबारों में एक खबर है कि गंगा और यमुना में मूर्तियों को विसर्जित नहीं किया जा सकेगा? यह खबर अच्छी है और आश्चर्यजनक है। लेकिन दो कारणों से चकित करती है। इसके दो करण हैं। एक तो यह  कि कहीं यह नदियों के प्रदूषण से ध्यान हटाने की कोई बड़ी साजिश तो नहीं? और दूसरा यह कि मूर्तियां साल भर में कितना प्रदूषण करती हैं? और मूर्तियां ही क्यों प्रतिबंधित हैं? एक अनुमान के अनुसार चमड़े की फैक्ट्री एक दिन में जितना नदी को प्रदूषित करती है, आस्था से विसर्जित मूर्तियां उतना बीस साल में भी नहीं कर सकतीं। तब सवाल है कि पूरा ध्यान इन मूर्तियों पर इसलिए तो केंद्रित नहीं किया जा रहा है कि इससे बड़े प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों से जनता का ध्यान भंग हो। यहां यह सब कहने का अर्थ यह नहीं है कि रसायनिक रंगों से रंगी मूर्तियां पानी में डालना उचित है। प्रदूषण तो एक बूंद का भी हो तो गलत है लेकिन मूल मुद्दा है कि हम प्रदूषण के हर प्रकार पर बात करें। वह औद्योगिक भी हो, धार्मिक या किसी अन्य प्रकार का, प्रदूषण की संपूर्णता में बात होना चाहिए और हर नदी-नाले, तालाब कुए जैसे भी जल स्रोतों पर यह नियम लागू किया जाना चाहिए। भारतीय हर नदी को गंगा का ही रूप मानता है। वह आधुनिक विकास प्रक्रिया में प्राकृतिक जल संसाधनों का बेरहमी से दोहन और शोषण किए जाने से देश की सभी प्रमुख नदियां जल प्रदूषण, भूक्षरण, की समस्याओं से ग्रस्त हैं और प्रवाह मार्ग में बांध, नहर निर्माण, जल प्रवाह के कृत्रिम मार्ग बनाने की प्रक्रिया आदि से नदियों में उथलेपन, जमाव, प्रवाह गति में कमी आदि की समस्याएं उत्पन्न होने से नदियों का जल ग्रहण क्षेत्र भी कम हो रहा है। भारत की परम पवित्र नदी गंगा में प्रदूषण को लेकर देश भर में चिंता व्याप्त है। भारत सरकार समस्या से अनजान नहीं है। सरकार का प्रदूषण नियंत्रण मंडल और जलसंसाधन मंत्रालय राज्यों के सहयोग से नदियों की स्थिति का जायजा लेती रहती है। जलसंसाधन मंत्रालय की सरकारी रिपोर्ट बताती है कि केवल गंगा ही नहीं बल्कि यमुना, नर्मदा, चंबल, बेतवा, सोन, गोदावरी, कावेरी आदि सभी प्रमुख नदियां जलप्रदूषण की गंभीर समस्या से ग्रस्त हैं और दिनों दिन नदियों में प्रदूषण की समस्या गंभीर होती जा रही है।
गंगा देश की प्रमुख नदी है और उसे पवित्र बनाए रखना समाज की जिम्मेदारी है। अप्रैल 1985 में गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत हुई और बीस सालों में इस पर 1200 करोड़ रुपये खर्च हुए। लेकिन हम वे चीजें नहीं हटाते जिनसे प्रदूषण फैलता है। ऋ षिकेश से लेकर कोलकाता तक गंगा के किनारे परमाणु बिजलीघर से लेकर रासायनिक खाद तक के कारख़ाने लगे हैं। उन्हें हटाने के लिए कोई योजना सरकार के पास नहीं है। जिन जनहित याचिकाओं पर यह फैसला आया है उनका प्रयास संपूर्ण प्रदूषण के लिए ध्यान केंद्रित करेगा और लोगों में यह जागरूकता आएगी कि नदियां सामाजिक जीवन का हिस्सा हैं उनकी सुरक्षा और स्वच्छता पहली प्राथमिकता होना चाहिए।

सीमांध्र की आग
वोट के लाभ और लोभ में लिए गए फैसले आग ही उगलते हैं। आंध्रप्रदेश का बंटबारा ऐसा ही फैसला साबित हो रहा है। इस आग में राजनीति रोटिंयां सेंक रही है और राज्य का विकास झुलस रहा है।

कें द्रीय मंत्रिमंडल ने पृथक तेलंगाना राज्य बनाने के सरकार के फैसले के साथ ही विरोध की दबी हुई चिंगारी आग की लपटों में बदल गई। हाल ही में इस विरोध को जगनमोहन रेड्डी ने यह कह कर नई हवा दी है कि राज्य को बांटने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी जिम्मेदार हैं और उनका एकमात्र लक्ष्य है राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाना। जगनमोहन रेड्डी सीमांध्र में बहुत लोकप्रिय हैं और उनके लिए राज्य का बंटवारा एक राजनीतिक वरदान साबित हो रहा है। तेलंगाना मुद्दे का फायदा उठाने में चंद्रबाबू नायडू जगन से पीछे  हैं क्योंकि उन्होंने काफी दिनों तक तेलंगाना बनाए जाने का विरोध नहीं किया था और उनका रवैया भी इधर उधर वाला रहा था। लेकिन कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि हर पार्टी और छोटे दल अपनी अपने चुनावी गणित में उलझे हैं और जनता को राज्य के बंटबारे की आग में झुलसने छोड़ दिया है।
 अलग राज्य की मांग को लेकर हिंसा और उपद्रव अब देश की राजनीतिक संस्कृति का अंग बन चुके हैं, लेकिन तेलंगाना के मामले में फिलहाल एक उलटी प्रक्रिया आकार ले रही है। वहां सीमांध्र के नाम से पुकारे जा रहे शेष आंध्र प्रदेश में राज्य के विभाजन के खिलाफ कहीं ज्यादा बड़े उपद्रव की रूपरेखा तैयार होती दिखाई पड़ रही है जबकि तेलंगाना को अलग राज्य बनाने का आंदोलन काफी पुराना है। यूपीए ने पिछले आम चुनाव में दबे ढंग से और उसके तुरंत बाद खुलकर इस आंदोलन के पक्ष में अपनी राय जाहिर की थी। ऐसे में अच्छा होता कि बीते पांच सालों में राज्य के व्यवस्थित विभाजन को लेकर सारी तैयारियां की जातीं। लेकिन जगनमोहन रेड्डी से कांग्रेस और यूपीए के जिम्मेदारों का कोई संवाद ही नहीं बन पाया। यह सब अचानक नहीं हो रहा है। कुछ सालों से आंध्र प्रदेश की राजनीति को जोड़े रखने वाले सूत्र पूरी तरह टूट चुके हैं और अलग राज्य का मामला वहां हिंसा   और घृणा का सबब बन गया है। सबसे बड़ी मुश्किल हैदराबाद को लेकर है क्योंकि पिछले दो दशकों से राज्य के सारे ही जिलों से पूंजी उठ-उठकर हैदराबाद और इसके आस-पास के इलाकों में आ रही है। तटीय आंध्र और रायलसीमा इलाकों के जिन लोगों ने लाखों-करोड़ों रुपए का निवेश, मकान, जमीन और फैक्टरियों में फंसा रखे हैं, और साथ में जो हजारों लोग  नौकरी करते हैं, उन सभी को हैदराबाद के तेलंगाना का हिस्सा बन जाने से अपनी पूरी दुनिया उजड़ती हुई लग रही है। सीमांध्र के लिए एक नई राजधानी और रोजी-रोटी देने वाला एक बड़ा औद्योगिक इलाका बनाना दस-बीस साल का काम है, जिसमें एक पूरी पीढ़ी खप जाएगी। ऐसे में लोगों को भरोसा दिलाने का काम बड़े राष्ट्रीय प्रयासों के जरिए ही हो सकता है। मुश्किल यह है कि अगले छह महीनों के चुनावी माहौल में इस तो क्या किसी भी मुद्दे पर न्यूनतम राष्ट्रीय सहमति बन पाने की भी कोई गुंजाइश नहीं है। ऐसे में सभी से शांत रहने और सारे मामले सुलझाने के लिए मुश्किल आशा ही की जा सकती है। आने वाले समय में बंटबारे की राजनीति अपना असर दिखाएगी।

मंगलवार, जुलाई 23, 2013

सूदखोरों का शोषण


 

निजी तौर पर ब्याज पर नकद रकम देना और फिर उसका चार गुना वसूल करना, गांव कस्बों से लेकर प्रदेश की राजधानी में
शोषण का यह कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है।



  ध्यप्रदेश के भोपाल में एक व्यक्ति ने सूदखोरों से परेशान होकर रेलवे ट्रैक पर कूद कर आत्म हत्या कर ली। यह एक सामान्य सी खबर हो सकती है लेकिन इसके पीछे सूदखोरी का दुष्चक्र दिखाई दे रहा है। भोपाल जैसे शहरों में जो हालात हैं वह बेहद भयानक हैं। सूदखोरी ने हजारों लोखों परिवारों का जीन दुस्वार कर दिया है। आजादी से पहले सूदखोरी की प्रथा को प्रेमचंद ने भारतीयों के लिए नरक निरूपित किया था।  इसमें गिरने के बाद शायद ही कोई एक दो पीढ़ी तक उबर पाता हो। आज पीढ़ी नहीं लेकिन राज्य के गली कूचों में फैले सूदखोरों द्वारा इनता शोषण किया जा रहा है कि लोगों का पूरा जीवन नरक बन जाता है। गलियों में, झुग्गियों में पलने वाले सूदखोरों ने एक समानांतर पैसे को ब्याज पर देने और उगाहने की क्रूर व्यवस्था बना रखी है। इस व्यवस्था में केवल शराबी, सट्टेबाज और आलसी ही नहीं हैं। बल्कि वे लोग अधिक हैं जो रोज कमाते खाते हैं। निम्न मध्यमवर्ग की बस्ती की हर गली में एक हजार दो हजार पांच हजार दस हजार देने वाले लोग मिल जाएंगे। इनका ब्याज सौ रुपए पर बीस तीस या चालीस रूपए प्रति माह होता है। कई दफा तो सीधा दोगुना भी। इस वेआवाज शोषण के दुष्चक्र में उन लोगों की तादाद अधिक है जो गांव से आकर बसे हैं। मजदूरी और मामूली नौकरी से अपना जीवन बसर करते हैं। रोज का धंधा करने वाले, रेहड़ी, ठेला आदि पर कारोबार करने वाले लोगा अक्सर दो चार हजार रुपए इसी तरह ब्याज पर रुपया लेकर अपना धंधा करते हैं। जब समय पर नहीं चुका पाते तो उनका ब्याज भी मूलधन में बदल जाता है और उनको एक साल में पांच हजार रुपए के बदले पच्चीस हजार भी चुकाना होते हैं। नहीं चुकाने पर धमकी, प्रताड़ना, जबरन वसूली, मारपीट के माध्यम से प्रताड़ित किया जाता है। जो लोग इस तरह सूदखोरी का शिकार होते हैं, वे गरीब और कमजोर तबकों के होते हैं और कई बार उनके परिवार को भी नहीं पता होता कि इतने ऊंचे ब्याज पर कर्ज लिया है।
इस मामले में प्रशासन और पुलिस की भूमिका बहुत कारगर नहीं है। सूदखोर अपने पैसे की दम पर धमकी और मारपीट को थाने तक पहुंचने ही नहीं देता है। ऐसे भी देखने में आया है कि पुलिस के सिपाही धन उगाही में सूदखोरों का सहयोग करते हैं। कई लोगों को पता नहीं रहता कि सूदखोरी भी एक अपराध है। सूदखोरी को उजागर करना, लोगों को इस मामले संवेदनशील बनाना जरूरी है। ब्याज सप्ताहिक 10 प्रतिशत है। याने प्रतिमाह 40 प्रतिशत और वार्शिक 480 प्रतिशत, जिसके तहत कर्ज में सिर्फ पैसा ही लगाया जाता है। जो सबसे खतरनाक है। इसके तहत कर्ज के बदले महाजन के पास जेवर, जमीन व मवेशी रखा जाता है। इसमें सबसे क्रूर बात यह है कि जेवर, जमीन व मवेशी की कीमत वास्तविक मूल्य से 400 फिसदी कम निर्धारित होती है तथा निर्धारित समय पर कर्ज वापस नहीं करने की स्थिति में जेवर, जमीन व मवेशी महाजन का हो जाता है। अधिकांश मामलों में कर्ज वापस नहीं होता है। इस तरह से समाज का एक बडा तबका कर्ज का जीवन जीता है और महाजन इसका लाभ उठाते ह तथा प्रशासन सिर्फ मूकदर्शक बना रहता है। सरकार ने कानून बनाकर सूदखोरी पर रोक लगा रखी है। उल्लंघन पर सजा का भी प्रावधान है। लेकिन पर्याप्त बैंकिंग सुविधाओं के अभाव में बहुत से लोग साहूकारों के चंगुल में फंस कर कर्ज के भंवर जाल में फंस रहे हैं। कई तो मौत को गले लगाने मजबूर हो रहे हैं।





सोमवार, फ़रवरी 11, 2013

आज का दर्शक बहुत जागरुक हो चुका है।

पीपुल्स लाइव फिल्म सिटी में चल रही फिल्म सिंह साहब दि ग्रेट की शूटिंग में फिल्म इंडस्ट्री के जानेमाने कलाकार अपने किरदार को अंजाम दे रहे हैं। जब तक फिल्म की शूटिंग चलेगी तब तक आई एम भोपाल आपको फिल्म के कलाकारों से बातचीत प्रस्तुत करता रहेगा। फिल्म में वे एक विलेन के रूप में अपना किरदार निभा रहे हैं। इंडस्ट्रीज में अपने अभिनय की पहचान बना चुके अमित बहल से रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति की बातचीत।

आप कई सालों से फिल्म एवं टीवी इंडस्ट्रीज में सक्रिय हैं। पिछले दस सालों में क्या चेंज आया है?

आज का दर्शक बहुत जागरुक हो चुका है। वह पब्लिसिटी और रियलिटी दोनों में फर्क करना जान चुका है। पहले एक हीरो की दम पर फिल्म चल जाती थी। लेकिन आज यह संभव नहीं है। आज का दर्शक इंटरनेट, टीवी, न्यूजपेपर्स और मैगजींस से सब जान लेता है। अगर कोई चीज से उसे नहीं पचती है तो वह तत्काल रिएक्ट करता है।
आज फिल्मों में मुंबई से बाहर निकल रही हैं। फिल्म में कई तरीके सफलता के लिए आजमाए जाते हैं, सफलता के मूलतत्व क्या हैं?
आर्थिक आधार पर फिल्म की सफलता को तीन चीजों से आंका जाता है, कितने दिन चली, कितने लोगों ने देखा, इकनोमिकली बेस्ड जो सफलता है वह ये है। आज कल सौ करोड़ के क्लब का हाइफ भी बना है। दूसरी तरफ हमारे पास सत्यजीत रे, विमल राय आदि हैं जिनकी फिल्में कभी इकनोमिकली सफल नहीं रहीं। आज हमारे पास इम्तियाज अली जैसे फिल्मकार भी हैं जो सफलता को नए अर्थ दे रहे हैं। जो भी हम करें उसमें ईमानदारी होना बहुत जरूरी है। ये काम की सफलता का सबसे बड़ा आधार है।
आप नाटकों से आए हैं इब्राहिम अल्का के साथ काम किया है आज के हिन्दी नाटकों के बारे में  क्या कहना चाहेंगे? क्या आज भी आप नाटक करते हैं?
नाटकों में मराठी का अपना नाटक था, बंगला का अपना संस्कार है लेकिन हिंदी का कोई माईबाप नहीं था। आज हिंदी नाटक नए अंदाज में सामने आ रहे हंै। नए नए प्ले राईटर आ रहे हैं। अनुवाद बहुत हो रहा है। इससे भी अच्छे नाटक हिंदी में आ रहे हैं। दायरा फैला है। रतन थियम का थियेटर भोपाल में हुआ ही था। राजीव वर्मा, संजय मेहता, ब व कारंत, आलोक चटर्जी आदि यहां हैं। इनसे हिंदी नाटकों को पहचान मिल रही हैं।

आज फिल्में भोपाल में बन रही हैं, लखनऊ और दिल्ली में शूट हो रही हैं? ये चैंज कैसे आया?

यह एक प्रकार का डिसेंट्रलाइजेशन है। यह जरूरी होता है। आज देश के कई बड़े शहरों में प्रोडक्शन की सुविधाएं उपलब्ध हैं। पहले ये सब नहीं होने से बाहर शूटिंग की जाती थी। किसी समय वैनिटी वैन को मुंबई से ही लाया जाता था लेकिन आज वह कई जगह मिल उपलब्ध हो रही है।
इससे एक फायदा ये हु आ है कि हम अपने ही देश को नए नजरिये से देख रहे हैं। छत्तीसगढ़ की शूटिंग के दौरान देखकर आश्चर्य होता था, हम इस मामले में बहुत रिच हैं। आज 100 साल भी लगातार फिल्में बनें तो शूटिंग की कमी नहीं होगी।

बुधवार, जनवरी 16, 2013

नाबालिग साबित होने के बाद

  दि   ल्ली गैंगरेप मामले में छठे आरोपी के नाबालिग साबित होने के बाद अब बहस छिड़ गई है कि मौजूदा कानून के मुताबिक वह कुछ ही महीनों में छूट जाएगा। एक रिपोर्ट ये भी है कि अगले पांच महीनों में बालिग हो जाएगा, लेकिन मौजूदा बाल सुधार कानून में किसी भी नाबालिग को उसके अपराध के लिए अधिकतम 3 साल की सजा हो सकती है। इस बहस के दौरान लोग क्रिमिनल जस्टिस लॉ 2012 की ओर देख रहे हैं जोकि संसद में पास होने के लिए लंबित है। लोगों की मांग है कि इसी संशोधन विधेयक में जुवेनाइल की उम्र 18 से घटाकर 16 कर दी जाए। जुवेनाइल एक्ट में बालिग उम्र की परिभाषा भी बदली जाएगी।  इस संदर्भ में कई विशेषज्ञों का मानना है कि 100 साल में बहुत कुछ बदल गया है। आनुवांशिक परिवर्तन, भौगोलिक परिस्थितियां और जीवन स्तर। ऐसे में नाबालिग की उम्र कम करने में किसी तरह की संवैधानिक अड़चन नहीं है। इसके साथ ही एजूकेशन सिस्टम, इंटरनेट और अन्य सूचना माध्यमों के जरिये बच्चों को बहुत सी जानकारियां प्राप्त हो रही हैं। जो उनकी परिपक्वता को बढ़ाती हैं, इसलिए नाबालिग की उम्र कम होनी चाहिए। कुछ वर्षों से बच्चों में हारमोनल चेंज भी तेजी से होने लगे हैं। उनकी सोचने और समझने की शक्ति बढ़ी है। 16 वर्ष के बच्चे में इस तरह के मनोवैज्ञानिक परिवर्तन साफ देखे जा सकते हैं। ये चीजें नाबालिग की उम्र को लेकर नए सिरे से विचार के लिए प्रेरित करती हैं।
नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2011 में हत्या व दुष्कर्म के अतिरिक्त दिल्ली जैसी जगह में लूटपाट में 64 तथा सेंधमारी-वाहन चोरी में 290 नाबालिग अपराधी पकड़े गए। आने वाले समय में यह समस्या और भी गंभीर हो जाएगी। अपराध की तरफ उनका झुकाव अभिभावकों और समाज दोनों के लिए खतरनाक संकेत है। यही कारण है कि अब बालिग होने की उम्र कम करने को लेकर बहस तेज हो गई है। चिकित्सा विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्री सभी एक जैसा सोचने लगे हैं। न्यायविदों की राय भी  है कि बालिग उम्र घटकर 16 वर्ष होना चाहिए। करीब 138 साल पहले इंडियन मेजॉरिटी एक्ट मार्च 1875 में बनाया गया था। जिसके तहत बालिग होने की उम्र 18 साल निर्धारित की गई थी। लेकिन इतने सालों बाद इंडियन मेजॉरिटी एक्ट में बदलाव न होना लोगों को अखरने लगा है। यहां यह देखना जरूरी है और जैसी कि बाल संरक्षण आयोग ने चिंता जाहिर की है कि इससे बालश्रम को समाप्त करने के प्रयासों को आघात पहुंचेगा क्योंकि देश में18 साल तक के बच्चों की संख्या 44 करोड़ है। उम्र कम होने से कई दूसरी सामाजिक समस्याएं जन्म ले सकती हैं। इस मामले में गहन विचार की जरूरत है। यहां यह विकल्प भी मौजूद है कि 16 वर्ष की उम्र का बदलाव भारतीय दंड संहिता के तहत हो। इसे विवाह, रोजगार, फैक्ट्री एक्ट, बालश्रम और अन्य सामाजिक-राजनीतिक निकायों में लागू नहीं किया जा सकता। अत: इस विषय में और विचार करते हुए विवेकपूर्ण रास्ता निकालना होगा। इसके लिए देश के विशेषज्ञों की टीम को भी अधिकृत किया जा सकता है।
ravindra swapnil prajapati

गुरुवार, दिसंबर 20, 2012

बच्चों में बढ़ती हिंसा

   बच्चों में बढ़ती हिंसा एक वैश्विक समस्या के रूप में सामने आ रही है। आने वाले वक्त में इसके और बढ़ने की आशंका है। हमें अभी से इसे सुधारने के प्रयास करना ही होंगे।


  रायसेन जिले के बरेली कस्बे में दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक  छात्रा ने पड़ोस में रहने वाली आठवीं की छात्रा पर केरोसिन डालकर आग लगा दी। दो दिन पहले ही अमेरिका में एक छात्र को गोली बारी करने की योजना में गिरफ्तार किया गया है। किशोर उम्र के बच्चों द्वारा हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं और इनसे कुछ बड़े सवाल जन्म ले रहे हैं। रायसेन जिले की घटना में आरोपी छात्रा का कहना है कि लड़की का परिवार उसके परिजनों पर चोरी का आरोप लगा कर बदनाम कर रहे थे। लेकिन इस आरोप के बाद भी कुछ ऐसे सवाल उठते हैं जो इसे एक गंभीर सामाजिक समस्या की तरफ इशारा करते हैं। किशोर उम्र लड़की के लिए  इस आरोप पर इतना बड़ा अपराध करना संभव कैसे हुआ। किशारी को किरोसिन की कैन कैसे हासिल हुई। वह हाथ में जलता हुआ डंडा लेकर किस दुष्साहस के साथ घर में आग लगाने के लिए दाखिल हुई। इससे भी बड़ी बात ये है कि आखिर उसमें इतनी हिंसा की भावना कैसे जनमी? इस हिंसा का स्रोत क्या है। निश्चय ही यह सिर्फ लड़की के अकेली चेनता की उपज नहीं हो सकती। कहीं न कहीं समाज में उपस्थित दूसरे कारण भी इसमें सहायक रहे होंगे। अपराध करने के लिए अपराध करने वाले के लिए कहीं न कहीं कल्पना की आवश्यकता अवश्य होती है। यह कल्पना कहां से मिल रही है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि यह घटना किसी न किसी टीवी और फिल्म मीडिया के दृश्यों का कोलाज लगती है। क्योंकि इसके समर्थन में एक पुराना शोध सामने आया है। ए एच स्टेन और एल के फ्रेडरिक ने यह शोध 1972 में ‘टेलीविजन कंटेंट एण्ड यंग चिल्ड्रेन’नाम से किया है। इसमें अमेरिका में असामाजिक तत्वों और उनके समर्थकों पर किए गए 48 शोध कार्यों का विश्लेषण करते हुए लिखा कि 3से 18 वर्ष तक की आयु के बच्चों में टेलीविजन के हिंसक कार्यक्रमों ने आक्रामकता में वृद्धि की है। विगत 30 वर्षों में जितने भी शोधकार्य हुए हैं वे इसकी पुष्टि करते हैं। टेलीविजन हिंसा के प्रभाव को लेकर किए गए अध्ययन इस बात की पुष्टि करते हैं कि टेलीविजन हिंसा से आक्रामकता के अलावा असामाजिक व्यवहार में इजाफा होता है। हिंसक रूपों का प्रभाव तात्कालिक तौर पर कई सप्ताह रहता है। कई लोग टेलीविजन हिंसा को अस्थायी तौर पर ग्रहण करते हैं या केजुअल रूप में ग्रहण करते हैं। केजुअल रूप में हिंसा बच्चों के व्यवहार में आक्रामकता में इजाफा करती है। मीडिया विशेषज्ञों ने तात्कालिक प्रभाव का अध्ययन करके बताया है कि दर्शक की रिहाइश, उम्र, लिंग, सामाजिक, आर्थिक अवस्था आदि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मीडिया द्वारा बच्चे पर हिंसा का प्रभाव न पड़े इसके लिए जरूरी है कि बच्चे को परिवार के जीवंत संपर्क में रखा जाए। उन बच्चों में कम प्रभाव देखा गया है जिनके परिवारों में सौहार्द का माहौल है अथवा जिन परिवारों में कभी मारपीट तक नहीं हुई। अथवा जिन परिवारों में सामाजिक विश्वासों की जड़ें गहरी हैं। किन्तु जिन परिवारों में बच्चों के साथ दुर्व्यवहार होता है, उत्पीड़न होता है। वहां बच्चे हिंसा के कार्यक्रम ज्यादा देखते हैं। जो बच्चे भावनात्मक तौर पर परेशान रहते हैं उन पर आक्रामक चरित्र सबसे जल्दी असर पैदा करते हैं। इस तरह के बच्चे हिंसा के कार्टून ज्यादा चाव के साथ देखते हैं।आक्रामक या हिंसक चरित्रों को देखने के बाद बच्चों में समर्पणकारी एवं रचनात्मकबोध तेजी से पैदा होता है। टेलीविजन कार्यक्रमों के बारे में किए गए सभी अध्ययन इस बात पर एकमत हैं कि इसके नकारात्मक प्रभाव से मानसिक उत्तेजना,गुस्सा और कुंठा पैदा होती है।

बुधवार, नवंबर 28, 2012

 
रिहाई की राजनीति

अपराध को नियंत्रित करना और समाप्त करना शासन की प्राथमिकता होती है। लेकिन कई फैसले जब शासन लेता है तो उसके राजनीतिक प्रभावों को नकारा  नहीं जा सकता।

मध्यप्रदेश सरकार ने तीन साल से कम साजा पाने वाले अपराधियों को रिहा करने का निर्णय लिया है। गृह मंत्रालय ने जिलों के लिए इस आशय का परिपत्र जारी कर दिया है। सरकार के इस फैसले का स्वागत किया जा सकता है, बशर्ते कि इसका दुरुपयोग न हो। हर ऐसे फैसले के साथ कुछ आशंकाएं जुड़ी होती हैं। सरकार जिन लोगों को विमुक्त करेगी जो सामान्य धाराओं के तहत जेल में हैं। जैसे आदिवासियों को 49 लीटर शराब जप्ती के प्रकरण हैं इससे कई आदिवासी रिहा होंगे क्योंकि आदिवासी समाज में शराब सामान्य पेय है जिसे वे सदियों से बनाते और पीते आ रहे हैं, उन पर नागर समाज के फैसलों को थोपना उचित की श्रेणी में नहीं कहा जा सकता। यहां सबसे बड़ी बात यह होगी जब सरकार रिहा किए गए अपराधियों में यह भाव पैदा करे कि वे पुन: अपराध के लिए नहीं छोड़े गए हैं। उन्हें मेहनती जीवन जीने के लिए रिहा किया गया है। चाहे तो सरकार इसके लिए उनको सामान्य प्रशिक्षण दिलवा सकती है। सामान्य: अपराध मनोविज्ञान और सामाजिक मान्यता है कि कोई भी व्यक्ति जन्म से अपराधी नहीं होता बल्कि कई बार हालात और कई बार अनजाने में लोग अपराध की राह पर चले जाते हैं। लेकिन यहां मामला दूसरा है। सामान्यतौर पर ये अपराध के गंभीर मामले नहीं हैं। अपराध की परिभाषा भिन्न-भिन्न रूपों में की गई है, जैसे- समाज द्वारा निर्धारित आचरण का उल्लंघन या उसकी अवहेलना अपराध है या किसी व्यक्ति की क्रिया या क्रिया में त्रुटि है, जिसके लिए दोषी को कानून द्वारा निर्धारित दंड दिया जाता है। अपराध करना एक सामाजिक समस्या है। इस पर कानूनी नियंत्रण तब होता है जब वह हो जाता है लेकिन पहले अपराध का जन्म मन-मष्तिस्क में  होता है।
जाने-अनजाने में अपराध करने वालों से नफरत करने के बजाए उनकी मूल समस्या का अध्ययन करके उसके समाधान का प्रयास किया जाना चाहिए और सही मार्गदर्शन से इस तरह के लोग आसानी से मुख्य धारा में शामिल होते रहे हैं। अपराध की परिभाषाओं के अनुसार किसी व्यवस्था के बनाए नियमों का उल्लंघन कर यदि कोई रात में बिना बत्ती जलाए मोटर साइकिल पर नगर की सड़क पर चले अथवा बिना पर्याप्त कारण के ट्रेन की जंजीर खींचकर गाड़ी खड़ी कर दे, तो वह भी उसी प्रकार दोषी माना जाएगा, जिस तरह किसी की हत्या करने पर। किंतु साधारण अर्थ में लोग दंडाभियोग को हत्या, डकैती आदि गंभीर अपराधों के पर्याय के रूप में ही लेते हैं। लेकिन सरकार के इस फैसले को सामान्य नहीं कहा जा सकता। इसमें सामाजिक कल्याण की भावना निहित है तो दूसरी तरफ यह चुनावों में मतदाताओं को रिझाने का उपक्रम भी माना जा सकता है। ये सारे निर्णय सरकार की राजनीतिक दूरदर्शिता का परिणाम हो सकते हैं। लेकिन उद्देश्य का पवित्र होना ही महत्वपूर्ण होता है। इससे सरकार में विश्वास कायम होगा और छोटे मोटे अपराधी भी एक सामान्य जीवन जीने की कोशिश करेंगे। लेकिन सरकार को रिहा किए जा लोगों से यह विश्वास हासिल करना होगा।

मंगलवार, नवंबर 06, 2012

संदर्भ से कटे नेताओं के बयान 

  संदर्भ से कटे बयानों के कारण नेताओं के बयान राजनीतिक विवादों को जन्म देते हैं। ये राजनीति से जुड़े लोगों को संवेदनशील तुलनाएं सोच समझ कर करना चाहिए ।


  सं दर्भहीन शब्द और बयान कितने विस्फोटक हो सकते हैं इसके कई उदाहरण इतिहास में मिल जाएंगे। सबसे पहला ज्ञात उदारहण है जब कृष्ण ने महाभारत युद्ध में द्रोणाचार्य को परास्त करने के लिए भीम से कहलवाया था- हतो अस्वथामा। यानी अस्वथामा मर गया। यहां संदर्भ नहीं बताया था कि अस्वथामा पुरुष था या हाथी के रूप में मरा था। संदर्भहीन वाक्य को सुनकर द्रोण ने समझा उनका बेटा मारा गया है। वे यह खबर सुन कर अचेत हो गए और उन्हें परास्त कर दिया गया। भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी द्वारा भोपाल में दिए बयान को कुछ इस तरह ही राजनीति में स्वीकार किया गया है, खबर देने वालों ने और राजनीति में स्वीकार करने वालों ने भी कुछ इसी तरह स्वीकार किया है। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा कि स्वामी विवेकानंद और माफ़िया डॉन दाऊद इब्राहिम का आईक्यू एक जैसा था लेकिन दोनों की जिÞंदगी की दिशा अलग थी। गडकरी के संदर्भ थे कि एक का आई क्यू निगेटिव था और दूसरे का आई क्यू पॉजिटिव था। यह बयान संदर्भ के साथ देखा जाए तो बहुत अच्छा है लेकिन अगर इसे संदर्भ से काट दिया जाए तो यह तुलना खतरनाक हो सकती है। मीडिया में ये बयान संदर्भहीनता की स्थिति में उठा लिए गए। इससे यह बयान बाजी को राजनीतिक रंगत मिल गई। इस बयानबाजी से राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। इस तरह संदर्भ सहित देखा जाए तो गडकरी का बयान उतना गलत नहीं था जितना शोर मचाया जा रहा है। अच्छे और बुरे दोनों व्यक्तियों का आईक्यू होता है,लेकिन दोनों में फर्क यहीं होता है कि एक अच्छे काम और दूसरा बुरे काम में अपना आईक्यू इस्तेमाल करता है। गडकरी का यह कहना भी गलत नहीं है कि मीडिया ने बयान को तोड़मड़ोर पेश किया,क्योंकि  मीडिया ने आधे अधूरे बयान को पेश किया है। अब जब राजनीति है तो ऐसे बयानों को राजनीतिक रंग तो दिए ही जाएंगे। ऐसी संवेदनशील तुलना से नेताओं को उसी प्रकार बचा जाना चाहिए जैसे कि दूध का जला छांछ भी फूंक-फूंक कर पीता है। बिना इसके कोई नेता  राजनीति  की उठापटक से नहीं बचा सकता। भारतीय लोकतंत्र में  हरेक दिन कोई न कोई नेता ऐसे बयानों से अनावश्यक विवादों को जन्म देता है। नरेन्द्र मोदी और शशि थरूर का मामला अभी ठंडा नहीं हुआ था कि नितिन गडकरी ने ताजा बयान देकर विवादों में हैं। पूर्व में भी नितिन गडकरी को कसाब और कांग्रेस वाले अपने बयान के कारण आलोचना का शिकार होना पड़ा था। कांग्रेस ने भाजपा अध्यक्ष के इस बयान की कड़ी आलोचना करते हुए उनसे सार्वजनिक माफी मांगने की मांग की है। हालांकि, नितिन गडकरी ने अपने बयान का खंडन करते हुए कहा है कि उन्होंने दाऊद और स्वामी विवेकानंद की कभी कोई तुलना नहीं की, न ही इसमें तुलना करने लायक कुछ है। लेकिन राजनीतिक लाभ हानि की प्रक्रिया में कई तरह के उतार-चढ़ाव आते हैं। नेताओं को अपने शब्द फूंक-फूंक कर ही बोलना चाहिए।

गुरुवार, अगस्त 09, 2012

बाढ़

  मध्यप्रदेश ही नहीं देश के अन्य राज्यों में भी बाढ़ से जनजीवन प्रभावित हो रहा है। हमें यह ख्याल रख कर दूरगामी बाढ़ प्रबंधन करना होगा कि कभी भी पानी अधिक बरस सकता है।

देश में प्रारंभिक मानसून की बेरुखी के बाद देश के कई हिस्सों में लगातार हो रही बारिश की वजह से बाढ़ के हालात बन गए हैं। पूर्वी उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में जमकर बारिश हो रही है। अकेले मध्यप्रदेश में ८त्न घंटे से हो रही भारी वर्षा के कारण ८ हजार परिवार (लगभग ६ञ् हजार लोग) आए हैं।  प्रकृति अपना काम करती है। पहले भी ऐसी बाढ़ें आती रही हैं। लेकिन मानवीय प्रबंधन की सीमाओं के कारण हालात दयनीय हो जाते हैं। पानी प्रकृति का प्रवाह है वह अपनी गति और नीति से बहता है। आज मध्यप्रदेश ही नहीं पूरा देश जल असंतुलन का शिकार है। ऐसी स्थितियों में बाढ़ प्रबंधन की भूमिका महत्वपूण हो जाती है।
नर्मदा व तवा नदी के खतरे के ऊपर बहने से आसपास के करीब ५ञ्ञ् गांव बाढ़ से घिरे हैं।  यहां के हालातों को सम्हालने के लिए सेना की मदद लेना पड़ी है। मध्यप्रदेश में भारी बारिश के चलते कुछ जिलों में दो दिनों की छुट्टी का एलान कर दिया गया है. कई दिनों की बारिश से कुछ फायदे तो हुए हैं लेकिन नुकसान भी कम नहीं हुआ है। लेकिन दूसरी तरफ देश के कुछ हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति है। राजस्थान में ७७ में से ६त्न जिलों में बारिश नहीं होने के कारण लोगों को पानी की चिंता सता रही है। केवल छह जिलों में सिर्फ बुवाई लायक ही बारिश हुई है।  राज्य सरकार ने अभी पाच जिलों को ही सूखाग्रस्त घोषित किया है। वहां ६त्न जिलों में अस्सी प्रतिशत तक कम बारिश हुई है।
दूसरी तरफ कुछ राज्यों में बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। उत्तर प्रदेश में उफनाई नदियों ने बाढ़ नियंत्रण उपायों की पोल खोल दी है। घाघरा, रामगंगा, वरुणा, शारदा, सरयू, राप्ती, जैसी नदियों का जलस्तर बढ़ा हुआ है। गंगा व यमुना का जलस्तर भी खतरे के निशान की ओर बढ़ रहा है। प्रदेश में बाढ़ प्रभावित ७त्र जिलों में  स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर है। बहराइच में उत्तरी तटबंध पर पानी का दबाव बढ़ने से कई जगह से रिसाव की सूचना है। बाढ़ पीड़ितों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने और भोजन आदि की व्यवस्था भी संतोषजनक नहीं है। ये शिकायतें प्रतिवर्ष हो सकती हैं लेकिन बाढ़ के लिए हम कितने तैयार होते हैं यह तभी पता चलता है जब बाढ़ आती है।
अगस्त ६ञ्ञ्८ में जो बाढ़ आई थी उस समय प्रधानमंत्री ने उस मौके पर बाढ़ प्रबंधन के लिए एक टास्क फोर्स बनाई थी। उसने दिसंबर ६ञ्ञ्९ में रिपोर्ट दी थी। उसमें बाढ़ प्रबंधन के लिए स्थाई और दूरगागी समाधान दिए गए थे। जहां तक बाढ़ के स्थाई प्रबंध का मसला है तो यह राष्ट्रीय मुद्दा है। मानसून से पहले देश में जगह-जगह बाढ़ से बचाव के प्रबंध अब एक अनिवार्यता हो चुकी है। जहां बांध बनाए जा सकते हैं वहां बांध बनाए जाना चाहिए।  जहां जरूरी हो वहां ड्रेनेज का इंतजाम भी होना चाहिए।  आने वाले वक्त में हमें देश के विकास और जीवन की सुविधाओं के विस्तारको भी ध्यान में रखना होगा। हमें यह ख्याल रखना होगा कि अतिवृष्टि कभी भी हो सकती है इसलिए  हमें बाढ़ प्रबंधन नए प्रयास करते रहना होंगे।

धर्म और जाति

  
PHOTO Aanil Dixit BHOPAL
धर्म और जाति की संकीर्णता से ऊपर रहने वाला देश ही चारों ओर से उन्नति करता है। इसलिए हमें समानता की दृष्टि से सबको देखते हुए सामूहिकता में विश्वास रखना चाहिए।

य ह बात उस समय की है जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने देश को ब्रिटिश गुलामी से मुक्त कराने के लिए आजाद हिंद फौज की स्थापना की थी। उन्होंने इसमें सभी संप्रदायों के लोगों को शामिल होने का न्योता दिया था। उनका विचार था कि भारत में रहने वाले सभी हिंदू, मुस्लिम, सिख आदि पहले भारतीय हैं फिर कुछ और।  यह विचार नेता जी का तो था ही, गांधी जी भी इसी विचार पर आधारित अपना आंदोलन चला रहे थे।
यह विचार समाज की सामूहिकता और मनुष्यत्व की महानता के लिए स्वीकार करता है। यही विचार है जो इसलिए वे आजाद हिंद फौज के दरवाजे सभी के लिए खुले रखते थे। जिसके भी सीने में देश को आजाद करने की आग हो, वह उनकी फौज में शामिल हो सकता था। इसलिए आजादी की इस सेना में सभी तरह के लोग थे।
कैप्टन शाहनवाज खान भी फौज में शामिल थे। एक बार अंग्रेजों ने उनकी देश की आजादी से संबंधित गतिविधियों को देख कर उन पर एक मुकदमा दायर कर दिया। इस मुकदमे से उनके लिए कई कष्ट प्रारंभ हो गए। उनकी मदद के लिए कई लोग आए। इस केस के लिए कैप्टन शाहनवाज को एक योग्य वकील की आवश्यकता थी। उनके वकील बने- भूलाभाई देसाई। तभी मुहम्मद अली जिन्ना ने कैप्टन को संदेश भिजवाया कि यदि आप आजाद हिंद फौज के साथियों से अलग हो जाएं तो आपका मुस्लिम भाई होने के नाते मैं आपका मुकदमा फ्री लड़ने को तैयार हूं।
शाहनवाज खान ने तत्काल जवाब भिजवाया- हम सब हिंदुस्तानी कंधे से कंधा मिलाकर आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमारे कई साथी इसमें शहीद हो गए और हमें उनकी शहादत पर नाज है। आपकी पेशकश के लिए शुक्रिया। हम सब साथ-साथ ही उठेंगे या गिरेंगे, परंतु साथ नहीं छोड़ेंगे। उनके इस सटीक जवाब से उनके सभी साथी और सैनिक खुश थे। उन्हीं में से उस समय एक सिपाही बोला- धर्म और जाति की संकीर्णता से ऊपर रहने वाला देश ही उन्नति करता है। इसलिए हमें समानता की दृष्टि से सबको देखते हुए सामूहिकता में विश्वास रखना चाहिए।
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पुरस्कार के लिए सत्पात्र कौन है?


मंत्री ने अपना मत प्रकट करते हुए कहा, ‘यदि ये आपस में एकता कायम कर लेते तो सहारा देकर किसी एक को ऊपर चढ़ा सकते थे, पर वे ईर्ष्यावश वैसा नहीं कर सके और असफल हो गए।

एक राजा ने अपने मंत्री से कहा- ‘मैं अपने प्रजाजनों में से किसी वरिष्ठ को कुछ बड़ा उपहार देना चाहता हूं। बताओ, ऐसे योग्य व्यक्ति कहां से और किस प्रकार ढूंढे जाएं?’
मंत्री ने कहा- ‘महाराज! सत्पात्रों की तो कोई कमी नहीं पर उनमें एक ही कमी है कि परस्पर सहयोग करने की अपेक्षा वे एक दूसरे की टांग पकड़कर खींचते हैं। यानी वे एक दूसरे से ईर्श्या करते हैं और एक दूसरे की बुराई भी करते हैं। हालांकि वे भले लोग होते हैं लेकिन वे सब भले होते हैं।’
राजा के गले यह बात उतरी नहीं। वह समझ गया कि मंत्री उसे कुछ उलझाना चाहता है।
राजा मंत्री से  कहा- यह इतने विश्वास के साथ कैसे कह सकते हो तुम? मंत्री ने कहा कि वह इसे साबित कर दिखाएगा। एक छह फुट गहरा गड्ढा बनाया गया। उसमें बीस व्यक्तियों के खडेÞ होने की जगह थी। घोषणा की गई कि जो इस गड्ढे से ऊपर चढ़ आएगा, उसे आधा राज्य पुरस्कार में मिलेगा। बीसों सबसे पहले चढ़ने का प्रयास करने लगे। जो थोड़ा सफल होता दिखता, उसकी टांग पकड़ कर शेष उन्नीस नीचे घसीट लेते। वह औंधे मुंह गिर पड़ता। इसी प्रकार सवेरे आरंभ की गई प्रतियोगिता शाम को समाप्त हो गई। बीसों को असफल ही घोषित किया गया और रात होते-होते उन्हें सीढ़ी लगाकर ऊपर खींच लिया गया। पुरस्कार किसी को भी नहीं मिला।
मंत्री ने अपना मत प्रकट करते हुए कहा, ‘यदि ये आपस में एकता कायम कर लेते तो सहारा देकर किसी एक को ऊपर चढ़ा सकते थे, पर वे ईर्ष्यावश वैसा नहीं कर सके। वे एक दूसरे की टांग खींचते रहे और खाली हाथ रहे। अगर उनमें एकता होती तो वे यह तय कर सकते थे कि किसी एक को जीतने दिया जाए और उसकी पुरस्कार राशि सब बराबर-बराबर बांट लें। पर वे ऐसा नहीं कर सके। मंत्री ने बताया - ‘चारों दिशाओं में प्रतिभावानों के बीच ऐसी ही प्रतिस्पर्धा चलती है और वे खींचतान में ही सारी शक्ति गंवा देते है। इसलिए उन्हें निराश हाथ मलते ही रहना पड़ता है।’ राजा मंत्री के विचारों से सहमत हो गया।’

रविवार, जून 03, 2012

रणनीति को खोती हुई पार्टी



 भारतीय जनता पार्टी ताकतवर विपक्षी दल से वंचित और अपनी रणनीति को खोती हुई पार्टी में बदलती जा रही है। हालिया तीन प्रकरणों से उसकी छवि अस्पष्ट और वैचारिक रूप से कमजोर दल की हुई है बल्कि उसके राजनीतिक मुद्दों पर ढुलमुल रवैये से भी जनता में उसके प्रति उपेक्षा -भाव पैदा हो रहा है।  इसके पीछे तार्किक आवधारणाएं मौजूद हैं। भाजपा के तीन प्रकरणों में पहला है उत्तरप्रदेश चुनावों में बाबू सिंह  कुशवाह का भाजपा में स्वागत करना। आडवाणी ने उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे बसपा के नेताओं को पार्टी में शामिल करने के गडकरी के फैसले की आलोचना की थी। हाल ही में आडवाणी ने ब्लॉग में लिखा है कि ‘उत्तर प्रदेश विधानसभा के परिणाम, भ्रष्टाचार के आरोप में मायावती द्वारा निकाले गए मंत्रियों का भाजपा में स्वागत किया जाना। इन सब घटनाओं ने भ्रष्टाचार के विरूद्ध पार्टी के अभियान को कुंद किया है। उस समय भी आडवाणी सहित कई वरिष्ठ नेताओं ने इसका विरोध किया था। दूसरा प्रकरण है मोदी का, जिसमें सुनील जोशी को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर बैठाया गया। और तीसरा प्रकरण मध्यप्रदेश के अध्यक्ष प्रभात झा का कमल संदेश का संपादकीय है। उन्होंने नितिन गडकरी और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर अपरोक्ष रूप से हमला बोला है। मुखपत्र में बिना किसी का नाम लिए कहा गया है कि पार्टी के कुछ नेताओं को आगे बढ़ने की जल्दबाजी है। पार्टी के बुनायदी ढांचे को नजर अंदाज कर आगे बढ़ने की ललक गलत है। जैसे-जैसे एक नेता प्रगति करता है उसकी सोच और समझ में भी प्रगति होनी चाहिए।
भाजपा का अंदरुन अंधड़ यहीं खत्म होने का नाम नहीं लेता। इसमें जेठमलानी भी इस तेज बहती हवा में अपना मुक्का तानते हैं। बीजेपी सांसद राम जेठमलानी ने पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी को 23 मई को कड़ा पत्र लिखा है। उन्होंने बीजेपी नेताओं पर आरोप लगाया है कि वे संप्रग सरकार के दूसरे शासनकाल में बड़े पैमाने पर व्याप्त भ्रष्टाचार पर चुप्पी साध आपसी मतभेद में ही उलझे हैं। देश भ्रष्टाचार के खिलाफ उत्तेजनापूर्ण कार्रवाई चाहता है।  सरकार प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद के लिए मैदान में उतारने की योजना बना रही है। बीजेपी इस मुद्दे पर चुप है, जिससे जनता समझेगी कि उसके पास भी कुछ छुपाने लायक है। जेठमलानी ने जो लिखा है वह जनता की अपेक्षाओं का सीधा वर्णन है। वे और भी बातें लिखते हैं जैसे कि देश समझ चुका है कि गरीबी और अभावग्रस्तता चारों ओर फैले भ्रष्टाचार और मुख्य रूप से हमारे वर्तमान शासकों द्वारा राष्ट्रीय संपत्ति की बड़े पैमाने पर लूट के कारण है। कमोबेश पूरे देश का मानना है कि मौजूदा केंद्रीय मंत्रिमंडल के आधे सदस्यों को जेल में होना चाहिए। जबकि बीजेपी के नेता एक दूसरे की टांग खींचने में व्यस्त हैं। सच यह है कि भारतीय जनता पार्टी अब अपने कमजोर पक्षों के ओवर फ्लो को झेल रही है। आने वाले वक्त में उसे देश का सशक्त विपक्षी गठबंधन तैयार करना था। अब भी समय है भाजपा गलतियों से सीखे और पुर्नस्थापित होकर मैदान में आए।
ravindra swapnil prajapati

शुक्रवार, मार्च 30, 2012

  धीमे जहर पर प्रतिबंध ऐतिहासिक फैसला



तंबाखू से जुड़े उत्पादों की सहज उपलब्धि से समाज में प्रतिरोध कम हो जाता है। प्रतिबंध के बाद इस पर नियंत्रण आसान होगा।


मध्यप्रदेश सरकार ने 1 अप्रैल से गुटखा पाउच बंद करने का एतिहासिक फैसला लिया है। प्रदेश में होने वाले कुल मुंह के कैंसर में 91 प्रतिशत  कैंसर तंबाखू के सेवन से होते हैं। यह फैसला स्वागत योग्य है और सरकार के वास्तविक कर्तव्य का अनुपालन भी है। किसी भी लोककल्याणकारी राज्य के लिए अपने नागरिकों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना ही चाहिए। मध्यप्रदेश ने यह कदम उठाकर बड़ी पहल की है।  अब डर इस बात का है कि गुटखा खाने वाले और बेचने वाले इस प्रतिबंध को प्रभावहीन बनाने में पूरा जोर लगाएंगे। वे नहीं चाहेंगे कि करोड़ों रूपए की आया देने वाला यह उद्योग बंद हो जाए। हो सकता है कि कुछ दिनों तक गुटखा पाउच चोरी छिपे या कालाबाजारी के तहत बिकें लेकिन इसके प्रभाव दूरगामी होंगे। फिलहाल हालत ये है कि 7 साल के कई बच्चों को गुटखे पाउच खाते देखा जा सकता है। जब कोई चीज बच्चों तक पहुंचती है तो उसके असर बेहद विनाशकारी ही होते हैं। आने वाले समय में गुटखा चबाने की प्रवृत्ति इसकी सहज उपलब्धता के कारण बेहद चिंता जनक तरीके से फैल रही थी। तंबाखू से जुड़े उत्पादों की सहज उपलब्धि से समाज में  प्रतिरोध कम हो जाता है। प्रतिबंध के बाद इस पर नियंत्रण आसान होगा। समाज में भी सजगता बढ़ेगी। मध्यप्रदेश सरकार इस कठोर निर्णय लेने के लिए बधाई की पात्र है।


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गरीबी की धुंध में धनुष

भारतीय तीरंदाजी में अपनी चमक बिखेरने वाली और देश के लिए कई मेडल जीत चुकीं झारखंड की 21 साल की निशा रानी को गरीबी से तंग आकर अपना धनुष बेचना पड़ा। जमशेदपुर जिले के पथमादा गांव की निशा की कहानी सैंकड़ों खिलाड़ियों की तरह है जो गरीबी की धुंध में खो गए। निशा 2006 में वह ओवरआॅल सिक्किम चैंपियन बनीं। झारखंड में हुई साउथ एशियन चैंपियनशिप में उन्होंने सिल्वर मेडल जीता। 2006 में बैंकाक में हुई ग्रां प्री चैंपियनशिप में ब्रांज मेडल जीतने वालीं निशा भारतीय टीम की मेम्बर रहीं। 2007 में ताइवान में हुई एशियन ग्रां प्री में उन्हें बेस्ट प्लेयर अवॉर्ड से नवाजा गया। भारतीय तीरंदाजी फेडरेशन और इंडियन ओलिंपिक एसोसिएशन उनके बारे में एक बार भी सोचता तो निशा इतना मजबूर नहीं होना पड़ता। एक धनुर्धर को अपना कीमती धनुष बेचना कितना तकलीफदेह हो सकता है इसकी कल्पना की जा सकती है। निशा रानी ने चार लाख रुपए का कमान मणिपुर की खिलाड़ी को 50 हजार रुपए में बेच दिया। ऐसा लगता है कि देश सिर्फ क्रिकेट को ही जानता है। इसमें सरकारों और खेल संगठनों की लापरवाही उजागर होती है। वे खेलों को लोकप्रियता से तौल कर देखते हैं। खेल एक संस्कृति है। जिम्मेदारों को हर खेल और उसके खिलाड़ी को बराबर महत्व देना चाहिए।