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सोमवार, अगस्त 24, 2015

जो लोग जीवन या विचारधारा को एक पक्षीय देखते हैं, वे विजय बहादुर सिंह के साथ नहीं रह सकते


                                                                                                             रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति


जिनसे हम ताकत लेते हैं और इतना संजो लेते हैं कि वह आपको सालों या जीवनभर तक काम में आए, उन पर कुछ भी लिखना तलवार की धार पर चलना या किसी अपरिचित से संतुलन को सहेजने की तरह होता है। मैं नहीं जानता कि विजय बहादुर सिंह मेरे लिए क्या हैं, लेकिन जो हैं वह एक अव्यक्त और अपरिभाषित छांव हैं जहां उनके विचार पत्तों की तरह मेरे आसपास बिखरे होते हैं। जब भी कहीं होता हूं और जीवन का कोई न कोई पक्ष, सर के मार्फत उस स्थिति, या उस परिवेश में झलक रहा होता है। विजय बहादुर सिंह इसी तरह मेरे लिए परिभाषित होते हैं। हर जगह हर परिस्थिति में। मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा कि उनसे नियमित मिला जाए। कई बार न मिल कर में उनके बीच में अधिक होता हूं। पिछले एक साल से यह स्थिति बनी है। कई बार मैं उनसे मिलने जाता हूं और डिपो चौराहे से यूटर्न लेकर वापस आॅफिस में बैठ जाता हूं।
आज में सोचता हूं कि विजय बहादुर सिंह सर से एक सीखा हुआ समय मैं किस प्रकार जी रहा हूं। मुझे जो मिलता उनसे, उसमें जिंदगी का हर पक्ष समाहित होता है। वह चाहे विचार हों, चाहे पक्ष या विपक्ष हो, समाज हो, परंपराएं हों या फिर लेखन हो, आज विजय बहादुर सिंह सब तरह से मेरे लिए एक व्यक्तित्व से अधिक पूरा परिवेश हैं। यहां परिवेश के रूप में वे जीवन के तमाम अनुशासन सिखाते हुए साथ होते हैं।
मेरा और विजय बहादुर सिंह का रिश्ता किसी शब्दिक परंपरा से परिभाषित नहीं होता, मेरा और उनका साथ होना एक दृष्टिकोण का निर्माण करता है।
आज मुझे लगता है कि मैं आज भी उनके साथ कई रूपों में साथ हूं। यह महसूस होना किसी भी संवाद के लिए एक जरूरी अनुशासन है।
विजय बहादुर सिंह मेरे दृष्टिकोण का निर्माण करने वाली प्रक्रिया के अभिभावक हैं। वे आलोचक अधिक हैं और मैं कवि अधिक हूं। कविता को समझने के प्रारंभिक दिनों में शब्द और अर्थ की कई परतें मैंने देखी हैं। कई साक्षात्कार किए हैं।
सर के लिए अनिवार्य शर्त है जिसे जीना है। अच्छे से जीना है। उनके लिए किसी की वैचारिक स्तर पर आलोचना करना, किसी के फरेब को नष्ट करना या उस पर हमला करना एक जरूरी प्रक्रिया है। वे मानवीय स्तर पर कुछ और सोच सकते हैं लेकिन वैचारिक स्तर पर हर किसी कवि या लेखक को नहीं बख्शते हैं। कविता पहचानने और उसमें निहित फरेब को पहचाना मैंने सर से सीखता रहा हूं।
क्योंकि वे कहते हैं कि आखिर चीजें एक परतीय नहीं होतीं। उनमें कई परतें होती हैं। इस निष्पत्ति के अनुसार कोई भी चीज एक पक्षीय नहीं हो सकती। इसमें विचार भी शामिल हैं। इस एक बात में हमारे कई दर्शन समाहित होते हैं। विजय बहादुर सिंह ने मेरे लिए लंबी यात्राएं रखीं।
मैं उनके कारण ही विविधता में चीजों को, विचारों और विचारधाराओं को देखना सीखा। जो लोग जीवन या विचारधारा को एक पक्षीय देखते हैं, वे विजय बहादुर सिंह के साथ नहीं रह सकते। क्यों? इसका कारण है वे आपकी चेतना को झकझोरते हैं, और यह बहुत कम लोगों को पसंद आता है। कई लोग बड़ी रुचि से मिलने जाते हैं और लौटते समय कहते हैं कि अरे विजय बहादुर सिंह तो बहुत मुश्किल व्यक्ति हैं। क्या मुश्किल हैं? क्योंकि वे आपके जड़ विचारों को हिला देते हैं।
ऐसा ही एक बार का उदाहरण है। दो युवा भोपाल से मिलने पहुंचे। उनमें से एक सरकारी इंजीनियर हो चुके थे और एक किसी आॅफिस में अधिकारी। दोनों साहित्य कविता में रुचि के चलते मिलने आए थे। विदिशा में विजय बहादुर वाली गली के उस घर में प्रवेश करते ही उनको अपने जूते उतारना पड़े। फिर मूंग की दाल, विदिशा वाला नमकीन और पुदीना वाली चने की दाल रिंगे ने उनकेसामने रखी। बहुत देर तक बातें होती रहीं। सर ने स्पष्ट कर दिया था कि मैं अभी कुछ नहीं खा सकता। वे इससे प्रभावित थे कि इतना स्वादिष्ट नमकीन में से डाक साहब कुछ नहीं खा रहे।
करीब तीस चालीस मिनट की बात हो चुकी थी। उस बात चीत में नमकीन भी खत्म हो रहा था लेकिन इतना खत्म नहीं हो पा रहा था कि प्लेटें साफ हो जाएं। उनमें जो नमकीन बचा है उसे पूरा खा लिया जाए। लेकिन उन युवाओं को लग रहा होगा कि प्लेटें पौंछ कर खा लीं तो अशिष्टता, और दूसरी तरफ सर को लग रहा था कि एक चम्मच नमकीन, दाल के कुछ दाने कचरे में फेंकने के लिए छोड़ना श्रम की कीमत का अपमान। बनाने वाले मजदूर की मेहनत का अपमान। अन्न का अपमान आदि।
उस समय मैं, श्रीकांत रिंगे और शैलेंद्र भावसार वहां थे। हम सर के सामने इन सब चरणों से निकल आए थे लेकिन वे दोनों युवा शिष्ट अधिकारी शायद अपने जीवन का, विजय बहादुर सिंह के सानिध्य में पहला चरण पार करने वाले थे।
बातचीत खत्म हो गई।
कुछ देर पहले जो बातचीत की जा रही थी उसमें कहा जा रहा था कि किसानों की समस्या क्या है? मजदूरों की समस्या क्या है? श्रम और पैसे का बंटबारा इतना असंगत क्यों होता जा रहा है।
उस समय किसानों और मजदूरों की बातें इस तरह होती थीं। आज तो इस तरह की बात करना आवश्यक नहीं समझा जाता, क्योंकि चमक-दमक में मजदूरों को सजा दिया गया है। कंपनी उनको ड्रेस देती है। बस अब लाखों करोड़ों युवाओं को 10 से बारह घंटे वातानुकूलित शो रूम अथवा मॉल में खड़े खड़े गुजारना होते हैं। या लाखों गार्ड दरवाजे पर   नीली-काली ड्रेस और टोप लगा कर खड़े रहते हैं। ये वो खेतीहर मजदूर हैं जो गांवों में ट्रैक्टर, थ्रेशर, हार्वेस्टर आने से बेरोजगार हुए। खेतों और खलिहानों से मानवीय श्रम  सिमट गया। खेतों की कटनई खत्म हो गई और वे सब शहर आ गए। आज उनको ही यहां खड़े रह कर प्रोडक्ट बेचना होते हैं। उनको महीने में मिलता है साढ़े पांच हजार, सात हजार या नौ हजार, किसी किसी को तेरह भी मिल जाता लेकिन किसी किसी को।
ये सजे धजे लाखों करोड़ों लड़के लड़कियां, मजदूरों, शोषित किसानों के समान ही हैं। इनके चेहरे कुपोषण से पिचके होते हैं। इनके चेहरे पर कोई भाव नहीं, बस एक रोबोट की तरह शो रूमों में, बड़ी दुकानों में, मॉल और स्टोरों में व्यस्त हैं।
ये सब शहर की झुग्गियों में रहते हैं। किसी सुविधाविहीन बस्ती के किसी मकान के एक कमरे में पांच लोग शेयर करके रहते हैं। उनको श्रम का पूरा हक नहीं मिलता।
कौन जिम्मेदार है? मध्यवर्ग को सपोर्ट करने वाली सरकारी नीतियां? लिजलिजे नीतिनिर्माता, जनप्रतिनिधि और सुरक्षित शोषण में लिप्त उच्च अधिकारी। शहरों में गांवों से आने वाले इस तरह के युवाओं का सिलसिला उस समय शुरु ही हुआ था लेकिन आज गांव शहरों की तरफ बाढ़ की तरफ आ रहा है और दूसरी तरफ देश का मध्यवर्ग सबसे लिजलिजे स्वरूप में फैल रहा है। नौकरीपेशा और व्यापार धंधे में मस्त इस वर्ग को देश की कोई चिंता नहीं है। यह समस्याओं पर बहुत गंभीरता से विचार नहीं करता। यह पूरा वर्ग भेड़चाल में यकीन करता है। एक सुरक्षित और खोल में बंद जीवन बिताता है। आदि आदि। गांव के ये युवा कुछ सालों बाद मध्यवर्ग के रूप में जड़ों से कटे हुए एक परिवार के रूप में शहर की सबसे पिछड़ी बस्ती का हिस्सा हो जाता है।
इस लंबी बातचीत का अंत अभी बाकी है।
दोनों युवा अधिकारी जाने के लिए तत्पर हो रहे थे। फिर आपसे मिलेंगे, हम आपको रचनाएं दिखाएंगे जैसे अंतिम चरण के संवाद कर रहे थे।
तभी सर की नजर उन प्लेटों पर पड़ी। करीब चार चम्मच नमकीन बचा होगा। उसमें अंकुरित मूंग भी थी। सर ने उनसे पूछा- क्या आप दोनों को श्रम के सम्मान का अर्थ पता है? वो एक दम हक्का बक्का और उठते-उठते बैठ गए। कुछ क्षण के बाद झिझकते  हुए  उन्होंने कहा-‘ नहीं डाक साब।’
ये जो आप प्लेट में नमकीन छोड़ कर जा रहे हैं। वह कचरे में चला जाएगा। क्या कोई किसान इतना अन्न इस तरह प्लेट में छोड़ सकता है? वह जानता है कि उसका एक दाना कितने श्रम से पैदा होता है। कितनी मेहनत के बाद वह खाने लायक का सृजन कर पाता है। इसीलिए किसानों को देखिए एक एक दाना बीनता है। हम इस तरह इसलिए छोड़ देते हैं कि हम उसके श्रम की पूरी कीमत नहीं चुकाते।
आपको ये सब पूरा खाना चाहिए। एक प्लेट को मैंने उठा कर, उसकी अंकुरित मूंग के कुछ दाने हथेली पर रख कर खा लिए। इसके बाद दोनों ने आहिस्ता से चम्मच से नमकीन के संपूर्ण कणों को सहेज लिया। बात जाने की हुई। दोनों उठे और सर की और पांव लागू करने लगे। फिर जूते पहने और दरवाजे के बाहर खड़े होकर कुछ और बातचीत।
मैं भी उनके ही साथ अपने रुम पर बाहर जाने के लिए बाहर निकल लिया। मैं सर से जाने के लिए नहीं पूछता था। मैं उनकी आंखों में देखता और वे मेरी बॉडीलैंग्वेज से समझ जाते थे कि अब मुझे जाना है। वे या तो बोलते ठीक है तुम जाओ। जो बातें हुई हैं उन पर विचार करना। या फिर सिर हिला देते, उसका मतलब भी यही होता ठीक है जाओ।
 मैं उनके पीछे गली के मोड़ पर आ गया था। वे आपस में बतिया रहे थे, साला ये कोई बात है प्लेटें खाली करवा लीं। ये तो इंसल्ट है। उन्होंने मुझे देखा और फिर वे दूर चले गए।
सर ने मुझसे आज तक नहीं पूछा कि वे बाद में क्या कह रहे थे और न मैंने कभी इसकी चर्चा की। मैंने उनको कभी फिर सर के यहां नहीं देखा।
सर का यह जो शिक्षण है, यह कमाल का है। बार बार सर के घर या उनसे मिलने वालों ने ऐसे कई चरण पार किए हैं।

रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति
101, आरएमपी नगर, फेस- 1, विदिशा मप्र
9826782660


बुधवार, जून 11, 2014

भोपाल का बड़ा ताल




भोपाल का बड़ा ताल । शाम का सिंदूरी सूरज ताल के भाल पर चमक रहा था जैसे कि राजा भोज तिलक लगा कर उस तरफ खड़े हैं। ताल की लहरें शाम की धूप की लाल  झीनी भीनी साड़ी पहने थीं। लहरें ऐसी चमक रही थीं जैसे उसकी चूनर चमकीली किनार हो।
मैं कई सालों बाद भोपाल आया था और घर आने के बाद सबसे पहला ख्याल आया ताल  के किनारों पर कुछ पल बिताऊं। यहां पहुंच कर मुझे अपने पिता के करीब होने जैसा अहसास हुआ। जैसे ये किनारे मेरे पिता की अंगुली है। सच वह कुर्सी जिस पर मैं कभी बैठता था आज भी वहीं थी बस उसका रंग बदल गया था। उस कुर्सी पर बैठ कर मैं सोचा करता था कि ताल  मेरा दोस्त भी है और मेरा पिता भी। उसके किनारे पर मेरे मन में कई ख्याल आते थे।
....
कई बार ताल  में तैरती नाव देख कर लगता था कोई विचार इस ताल  में तैर रहा है। सच कहूं तो मुझे ताल  ने अपना सब कुछ दिया। जीवन की लहरों से लड़ने की ताकत ताल  की लगातार उठती लहरें दे रही थीं।
 इसके किनारों पर जलते विदग्ध हृदयों को शीतलता देने वाले हवा के झोंकों में रखी ठंडक राहत देती है। प्यार देती है उस आग को सहन करने वाली। ताल  के ये किनार कई बार आंसुओं से भीगे हैं। इन आंसुओं में कई कहानियां हैं जो यहीं इन किनारों में दफन हैं। कहीं वादा किया किसी ने तो कहीं बदलते वक्त के साथ सिर्फ दोस्ती है कमिटमेंट नहीं। हम प्यार करेंगे और करते रहेंगे जब तक चलता रहेगा। फिर किसी दिन आके यहीं तोड़ देंगे वह कसम जो किसी गांठ की तरह हमने बांधी थी।
आज में कई सालों बाद भोपाल की ताल  पर टहल रहा हूं। बहुत कुछ इसके किनारों को बदल दिया है। पक्के कर दिए हैं। पर वो पत्थरों पर बैठ कर पानी को झूले की अभिलाषा यहां पूरी नहीं होती। पानी के करीब रहने का अहसास इंसान की आदिम भूख रही है। शायद इंसानी सभ्यता और आदिम जमाने में भी इंसान को पानी  चाहिए होता था। सच में यह ताल भी जब बनाया गया होगा तो यही सोच कर कि इंसान पानी के करीब रहेगा। भोपाल के इस ताल को मैं अपने दिल में वैसे ही दर्ज करता हूं जैसे आंखों में पिता की यादें।
अब यहां इस ताल पर वैसी शांति नहीं है। लोगों की भीड़ शाम को बहुत बढ़ जाती है। मुझे लगता है कि इस भीड़ में हम भी हैं। ये सारे चेहरे ताल  के किनारे अपने अपने होने का अर्थ खोजते हैं।
मुझे बढ़ती भीड़ कई बार परेशान करती लेकिन मैंने इस भीड़ में भी अब ताल  के साथ रहना सीख लिया है। आइए आप भी सभ्यता के हजारों साल पुराने इस ताल  से  दोस्ती कर सकते हैं। बस उसके किनारों पर जाना होगा।

रविवार, अक्टूबर 27, 2013

गांव से एक दिन......... कविताएं


 
रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति

   
आत्मकथ्य
मेरे लिए अपने आपको गांव या शहर में किसी भी रूप में बांटना मुश्किल होता है। खुद को और कविता को बांटना मेरे लिए संभव नहीं होता है। मैं समझ नहीं पाता कि वह कौन सी सीमा रेखा है जिससे समाज अलग अलग होता है। हम सुविधाओं के लिए खुद को अलग अलग सीमाओं में बांटते हैं लेकिन दरअसल वे कोई सीमा होती नहीं हैं। वे एक ऐसा बिंदु होती हैं जिसको हम सुविधा के लिए स्वीकार करते हैं। यहीं दूसरी बात ये है कि आखिर मैं क्यों नहीं बांट पाता? क्या कारण हैं कि ऐसा है? यहां अपनी बात एक उदाहरण से स्पष्ट करना जरूरी है। विज्ञान के नजरिये से देखें तो अंधेरा और उजाला कोई दो स्थितियों या पक्षों का प्रतीक नहीं हैं। वे प्रकाश कणों की विरलता और सघनता का स्तर ही होते हैं। जब बहुत अधिक प्रकाश कण होते हैं तो दिन होता है और जब वे धीरे धीरे कम होते जाते हैं, उनमें विरलता आती जाती है तो वे अंधेरे का निर्माण का भ्रम देते हैं। यानी स्केल एक ही होता है। अब जब स्केल एक है पैमाना एक है तो आप उसे दो अलग पक्ष जब करेंगे तो एक सुविधा के लिए करेंगे। यह सुविधा प्रशासन के लिए ठीक है कि रात हो गई तो लाइट की व्वस्था की जाए। या शहर से बाहर जंगल या गांव आ गए है तो विशेष चौकी की स्थापनाएं की जाएं लेकिन ये कविताओं के लिए भाव के लिए संभव नहीं हैं। कम से कम मैं अपनी जिम्मेदारी पर स्वीकार करता हूं कि मेरे लिए यह अलगाव स्वीकार नहीं.... यही कारण है कि मैं गांव को सभ्यता के स्केल के निम्मतम हिस्सों से उच्चतर हिस्सों की ओर आने वाले वर्ग की तरह देखता हूं।

1
गांव से एक दिन

मैं गांव में था तो सिर्फ गांव में नहीं था
कुछ गांव भी मुझमें था

चीजें सिर्फ गांव के मेढ़े तक नहीं थीं
कुछ इस तरफ और कुछ उस तरफ थीं
शहर सपनों की चादर में चिपक कर आता रहा
मैं शहर और गांव दोनों में खुद का जीता रहा

एक बस आती थी-धूल का बादल लिए
वह पहला गुब्बारा था जो शहर से गांव आया
उसी में कुछ हवाएं कुछ कल्पनाएं आती थीं
शहर कैसा होता है न जाने कितने किस्सों के साथ

जब मैंने शहर नहीं देखा था, पर शहर था
देखे थे रंगीन जगमगाते दृश्य
यह शहर टीवी की स्क्रीन से उतरा था
गांव के लड़कों के दिमाग में जाकर छुप गया था

गांव के आंगन में शहर आता था
बस में रखा थैला बन कर
बिस्कुट का एक पैकिट और कुछ खिलौने साथ
शहर में सब कुछ क्यों होता है?

आज सोचता हूं
मेरा गांव धीरे-धीरे शहर से चिपक रहा है
मैं एक नक्शे की तरह दोनों में दर्ज




2
पुल से लिपट कर रोती नदी

पुल बना और गांव सुंदर हुआ
नदी सूखी तो गांव ने इधर-उधर देखा
यह अचानक सब नहीं हुआ था लेकि न
उत्तर किसी के पास नहीं था

मेरे गांव के लोगों के लिए
कुछ मील दूर सुनाई पड़ता था किसी काम का शोर
वहां बजते रहते थे विशाल इंजिनों के सिलेंडर
धुंआ और मजदूरों की लंबी सासें जिंदा दिन रात
मिट्टी को अलटती मशीनों की लंबी भुजाएं

रात को भी नहीं रुकती थी आवाज की बाढ़
काम लगातार होता था गांव को पता नहीं था
पुल नदी के लिए बनाया था या सूखने के लिए

वे आवाजें एक दिन पूरी तरह शांत हो गर्इं
मशीनें खराब पुरजे छोड़ कर न जाने कहां चली गर्इं
आसमान से देवता देखते थे यह सब
गांव सोचता था किसी देवता की करामात है यह
जैसे ही काम रुका नदी ने सूखना शुरु कर दिया

पुल एक सूखी नदी पर एक स्मारक था अब
जिस पर वक्त ट्रकों की तरह गुजरने लगा था

नदी बीमार गाय की तरह गांव में आती है
जब भी पुल के नीचे से गुजरती है
शाम की रोशनी में पुल से लिपट कर रोती है

3


तुम्हारा गांव और तुम

मेरे दोस्त मुझे नहीं चाहिए गांव
नहीं चाहिए इन गांवों की तरीफ

यहां कांटे कीचड़ पत्थर हैं
मेरे गांव को शहर बना दो

मैं बदल रहा हूं अपना गीत
जब तुम आते हो अपने गांव
दो दिन में ही लौट पड़े हो
क्यों न रहे तुम अपने गांव?

खेत नहीं खलिहान नहीं फिर कैसा ये गांव बचा
बैल नहीं, तालाब नहीं फिर ये कैसा ये गांव रहा

कोई नहीं लौटता गांवों में रहने
शहरों का अपराध लिए तुम भी


धीरे धीरे बच कर यादों की नाव चलाते
ओ कवि तुम हमको भी शहर बुला लो 

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4

परंपराएं


जब गांव सरककर हाईवे पर दुकान खोल लेता है
अपने गांव को याद करना कितना मुश्किल हो जाता है
बेचता है गन्ने का रस, सिगरेट, चाय और पेटिस
यह न जाने कहां से आ जाता है अपने आप दुकानों में

न जाने कैसे लोग आते हैं यहां
बगल में दादी चीखती सी है-
मांगते क्यों है वही जो वे खाना चाहते हैं
हम खाते हैं वे क्यों नहीं खाते वह

ये शहर वाले भी कभी गांव वाले थे
लाल मिर्च की सब्जी और तेल वाला गुरगा
आज क्यों कहते हैं मिर्च कम शकर कम
मीठा खाना तो नहीं रहा बुरा जन्म भर से
फिर शहर में ये क्या करने लगे ऐसा
शक्कर भी नहीं गुड़ भी नहीं मिरचा भी नहीं

अरे हमारी तो परंपरा रही है मीठा खाने की
मिरचा में दगा मुरगा और ज्वार की रोटी

ये शहर वाले मिरचा भी नहीं खाने देते
मीठा भी खाने से डरते डराते हैं भला
सारी ज्वार तुला कर ले गए खेतों से
बीज भी न बचने दे रहे यहां

समेटते से लगते हैं मेरे गांव की परंपराएं
लड़कियां भी गांव में शहर की तरह पंसद करते हैं

एक दादी भी कुछ दिन वकालत करेगी गांव की
फिर चली जाएगी जलने और   में एक दिन के लिए आऊंगा
इसके बाद गांव जल्दी जल्दी शहर होने की कोशिश करेगा

कोई भी कुछ नहीं करेगा
सारे गांव वाले कम शकर और कम मिर्च खाने लगेंगे







शुक्रवार, जुलाई 19, 2013

दो पैसे के लिए लोगों का धर्म-कर्म सब बिक रहा है

 
बच्चों को भोजन देने में जितनी लापरवाही इस देश में हो रही है उसे देख कर लगता है कि हम किसी आत्माविहीन देश में रह रहे हैं, जहां दो पैसे के लिए लोगों का धर्म-कर्म सब बिक रहा है।





बिहार में मध्यान्ह भोजन त्रासदी में बच्चे अपने जीवन को जीने से पहले ही मौत की तरफ धकेल दिए गए। मध्यान्ह भोजन खाने से बीमार पड़ने जैसे शिकायतें तो आती रहती थीं लेकिन उसमें जहर भी हो सकता है यह कल्पना से परे है। इस
त्रासदी के बाद केन्द्र सरकार ने निगरानी समिति गठित करने का निर्णय किया है जो आपूर्ति किये गए भोजन की गुणवत्ता को देखेगी। उम्मीद की जाती है कि समिति मौजूदा मध्याह्न भोजन निगरानी समिति के प्रयासों को आगे बढ़ाने में मदद करेगी जो साल में दो बार बैठक करती है और राज्यों को किसी तरह की कमी के बारे में सचेत करती है। बिहार के सारण जिले में जहरीला मध्यान्ह भोजन से बच्चों की मौत सिर्फ दुखद है। इसने देश को झकझोरा है। भारत में सरकारी कामकाज गरीबों के लिए कोई मुद्दा ही नहीं है। मिलावटी राशन, खाने के सामान, मिठाइयां, सब कुछ  मिलावट की भेंट चढ़ता जा रहा है। सब कुछ जहरीला हो रहा है।  स्कूलों में खाना खाने वाले बच्चे समाज के सबसे कमजोर तबकों से आते हैं, इसलिए वे ही इसे खाने का खतरा उठाते हैं। अगर यह योजना बच्चों का सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि उनके लिए अच्छा पोषण सुनिश्चित करने के लिए है, तो इसमें सबसे ज्यादा ध्यान खाने की गुणवत्ता पर दिया जाना जरूरी है। लेकिन भ्रष्टाचार और लापरवाही इतनी अधिक है कि कहीं  ठीक खाना बच्चों को मिल रहा हो, तो यह उन बच्चों का सौभाग्य है। वरना तो हमारा प्रशासन और इसके लिए जिम्मेदार लोगों ने अपना कर्तव्य और ईमान सब कुछ बेच दिया है। घटना के बाद  राजनेता बयानबाजी करके राजनीतिक लाभ लेना चाहते हैं, उन्हें भी एक बार  सोचना होगा कि इस भ्रष्टाचार और लापरवाह तंत्र को बनाने में उनकी जवाबदेही भी है। इससे पहले भी मध्यान्ह भोजन की गड़बड़ियों को सुधारने की कोशिशें की गईं थीं। ये कोशिशें नाकारा साबित हुईं, क्योंकि इस कार्यक्रम का दारोमदार जिन लोगों पर है, उन्हें ही इस कार्यक्रम पर यकीन नहीं है। हमारे देश में अच्छी योजनाएं बनती हैं, उनके पीछे अच्छे उद्देश्य होते हं, लेकिन उन पर अमल इसलिए नहीं हो पाता, क्योंकि जिन लोगों को लागू करना है, वे इसे नौकरी का हिस्सा मानते हैं। हमारे प्रशासन में किसी को जवाबदेह बनाने की कोई कोशिश नहीं होती। जिन अधिकारियों और शिक्षकों को ग्रामीण बच्चों को पढ़ाने और भोजन देने का काम सौपा जाता है, वे यह मानकर चलते हैं कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले और मिड डे मील खाने वाले बच्चे समाज के निम्न और कमजोर लोगों के बच्चों के लिए है। यह वर्ग मानता है कि इन बच्चों को जैसा भी भोजन मिल जाए, वही काफी है। उस भोजन की गुणवत्ता उनके लिए कोई मायने नहीं रखती। इस घटना के बाद जैसे कि खबरें आ रही हैं कि इस भोजन में जहर था तो यह और भी दुखद है। इस देश में बच्चों के साथ इतनी क्रूरता की जा सकती है तो यह हद दर्जे कि हम किसी आत्माविहीन देश में रह रहे हैं, जहां दो पैसे के लिए लोगों का धर्म-कर्म सब बिक रहा है।

शनिवार, मार्च 16, 2013

हमें पता होता तो...


सरकारी अस्पताल और सरकारी कर्मचारियों की मानसिकता जिसकी लाठी उसका काम वाली हो चुकी है। यह न प्रजातांत्रिक मूल्यों के अनुसार है और न उनकी सेवाओं के अनुरूप न्यायसंगत।

स्व तंत्र और जागरूक देश में अधिकांश सरकारी कर्मचारियों की मानसिकता का पता नीचे दिए वक्तव्य से चलता है। इछावर और सीहोर के जिला अस्पताल के कर्मचारियों ने शहीद की पत्नी का इलाज नहीं किया। जब यह बात अस्पताल के जिम्मेदार अधिकारी को पता चलती है तो वे कहते हैं कि अगर हमें किसी ने बता दिया होता कि   शहीद की पत्नी हैं तो वे उसकी अलग से व्यवस्था कर देते। यह अलग से व्यवस्था का क्या अर्थ है? यही कि सरकारी अस्पताल देश के लोगों को उनकी हैसियत से अलग-अलग उपचार देते हैं। यही कि अगर किसी राजनीतिक या सामाजिक रूप से प्रभावशाली व्यक्ति का फोन पहुंचता है तो वे उस मरीज की देखभाल को प्राथमिकता देते हैं। जन सामान्य के रूप में कोई पहुंचता है तो उसके उपचार में तमाम लापरवाहियां करते हैं। यह मानसिकता दर्शाती है कि हमारे कर्मचारी खुद को जन सामान्य का सेवक नहीं मानते। आए दिन होने वाली ऐसे घटनाक्रम केवल सरकारी अस्पतालों में ही नहीं तमाम सरकारी महकमों में घटते हैं।
जब कोई समाज या देश वीआईपी की मानसिकता से ग्रस्त होता है तो उसे स्वस्थ समाज की संज्ञा नहीं दी जा सकती। इस देश में मुंह देखी, पहचान, पॉवर, प्रतिष्ठा और भाई भतीजावाद की मानसिकता इस कदर हावी है कि जो न्यायसंगत है वह घटता ही नहीं है। जनता की सेवा न करने की भावना सरकारी कर्मचारिकयों गहरे पैठ चुकी है। वे जनता के सेवक खुद का मानते ही नहीं हैं। अक्सर गांव के लोग बातचीत में सरकारी कर्मचारियों को कहते हैं, ये तो सरकारी दामाद हैं। जनता हर जगह इस रुखे व्यवहार से क्षुब्ध है। नगर पालिकाओं में विधवा, वृद्ध और बच्चों से सीधे मुंह बात नहीं करते। इस मामले में केंद्र राज्य सरकार के कर्मचारियों के हाल एक जैसे हैं। रेलवे और डाकघरों में जिस तरह का रुक्ष व्यवहार जनता के साथ किया जाता है, उसे वहीं जाकर देखा जा सकता है।  पुलिस थानों की जन सामान्य में नकारात्मक छवि बनी हुई है। लोग बातचीत में कहते हैं कि पुलिस की वर्दी को देख कर सुरक्षा का अहसान नहीं जागता। लगता है कि कहीं किसी मामले में फंसा तो नहीं देंगे। यह डर न तो एक दिन में बनता है और न एक दिन में खत्म होता है। अच्छे व्यवहार का कौशल समाज के प्रति निरंतर सजगता और प्रशिक्षण से संभव होता है। हम आज तक अपने मानव संसाधन को जिम्मेदारी का भाव नहीं सिखा पाए। निश्चय ही इसमें सरकारों के राजनीतिक नेतृत्व की अदूरदर्शिता भी शामिल है। जो खुद  शासन करने की मानसिकता से अभी भी ग्रस्त हैं। तब वे क्यों कर्मचारियों में स्वतंत्र और निष्पक्ष काम की जिम्मेदारी की भावना पनपने देंगे। सरकारी कर्मचारी अच्छे काम करने से पदोन्नत नहीं होते। यही कारण है कि हम सरकारी कर्मचारियों को जड़ता से मुक्त नहीं कर सके हैं। कर्मचारी सोचते हैं,अच्छी सेवा अधिक महत्वपूर्ण है, थोड़ी सी चापलूसी करना। आज इस विचार को तोड़ने की जरूरत है और शासन भी कर्मचारियों में सेवा की भावना स्थापित करने के उपयों को लागू करना चाहिए।
Ravindra Swapnil Prajapati

सोमवार, जुलाई 23, 2012

भोपाल में मेहनत करती कांग्रेस


कांग्रेस ने जिस घेराव को अंजाम दिया, वह इस बात का संकेत भी है  कि कांग्रेस-कार्यकर्ताओं ने राजनीति के मैदान में मुकाबले की कुछ तो तैयारी कर ली है।



रा जनीति के धुरंधरों के हिसाब से चुनाव करीब ही आ चुके हैं। मैदानी कार्यकर्ताओं की हलचलों के साथ राजनीति से जुड़ी सत्ता की खीर में जबर्दस्त महक आने लगी है। पार्टियां तैयारी कर रही हैं। कार्यकर्ताओं का गुणा-भाग और शक्ति प्रदर्शन शुरू हो चुका है। मानसून सत्र के बाद इसमें और अधिक गर्माहट और महक बढ़ गई है। कांग्रेस ने अपने सोए हुए मैदानी सिपाहियों को जगा कर शुक्रवार को विधानसभा के घेराव के नाम पर शक्ति प्रदर्शन किया। यह शक्ति प्रदर्शन इस बात को लेकर था कि कांग्रेस के दो विधायकों की सदस्यता भारतीय जनता पार्टी ने छीन ली है। सच तो यह था कि विधायकों की बर्खास्तगी कांग्रेस के लिए मुद्दा नहीं बनता यदि कांग्रेस विधायकों की बर्खास्तगी के उत्तरार्ध पर विचार किया जाता। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के विधायकों ने ताबड़तोड़ अंदाज में विधानसभा के गलियारे में बैठे, आसंदी पर कब्जा करने वाले विधायकों को प्रस्ताव लाकर इतनी सख्त राजनीतिक सजा दी कि वह जमीनी आंदोलन की प्रतिक्रिया में असर पैदा करने वाली घटना बन गई। 
विज्ञान का एक प्राकृतिक नियम है क्रिया के अनुरूप प्रतिक्रिया होती है। जितनी सख्त क्रिया (यहां विधायकों की सजा) तो उसकी उतनी ही सख्त प्रतिक्रिया (कांग्रेस का घेराव) होना ही था। इस कांग्रेसी क्रिया प्रतिक्रिया में चुनाव आयोग भी आ गया। उसने विधानसभा अध्यक्ष के आदेश के बाद दोनों विधायकों की सीटों को रिक्त घोषित कर दिया। मामला कांग्रेस के विधानसभा घेराव के शक्ति प्रदर्शन से अधिक अब वैधानिक फिसलन में समा गया है। सत्ता पक्ष ने विधायकों की बहाली के संकेत दिए लेकिन चुनाव आयोग के कारण यह मामला पतंग की उलझी डोर की तरह हो गया है। अब इसे सुलझाने और समाधान के लिए सिरे खोजने के प्रयास जारी हैं।
कांग्रेस ने जिस प्रकार शार्ट नोटिस पर घेराव को अंजाम दिया, वह इस बात का संकेत भी है  कि कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने राजनीति की रणनीति के मैदान में मुकाबले की कुछ तो तैयारी कर ली है। कांग्रेस के राजधानी भोपाल में दाखिले के दौरान विधानसभा का घेराव प्रमुख रहा। जनता से जुड़े मुद्दों पर कार्यकर्ता में कोई बहुत व्यापक प्रतिक्रिया नहीं थी। इसके राजनीतिक असर क्या होंगे? यह आने वाले वक्त में विश्लेषण का हिस्सा है। फिलहाल विश्राम करती हुई कांग्रेस को झंझोड़ने वाला काम भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा में अंजाम दे दिया है।
क्रिया की प्रतिक्रिया में एकत्रित कांग्रेसी कार्यकर्ता जनता में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रदर्शन को भाजपा के किसान महापंचायत से भी जोड़ा जा सकता है। लेकिन राजनीतिक रूप से दोनों की कोई तुलना नहीं की जा सकती। कांग्रेस को घेराव से अधिक एक सुव्यवस्थित राजनीतिक कार्यक्रम को जनता के सामने रखना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होता भाजपा एकमात्र विकल्प बनी रहेगी। ा