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सोमवार, अगस्त 24, 2015

जो लोग जीवन या विचारधारा को एक पक्षीय देखते हैं, वे विजय बहादुर सिंह के साथ नहीं रह सकते


                                                                                                             रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति


जिनसे हम ताकत लेते हैं और इतना संजो लेते हैं कि वह आपको सालों या जीवनभर तक काम में आए, उन पर कुछ भी लिखना तलवार की धार पर चलना या किसी अपरिचित से संतुलन को सहेजने की तरह होता है। मैं नहीं जानता कि विजय बहादुर सिंह मेरे लिए क्या हैं, लेकिन जो हैं वह एक अव्यक्त और अपरिभाषित छांव हैं जहां उनके विचार पत्तों की तरह मेरे आसपास बिखरे होते हैं। जब भी कहीं होता हूं और जीवन का कोई न कोई पक्ष, सर के मार्फत उस स्थिति, या उस परिवेश में झलक रहा होता है। विजय बहादुर सिंह इसी तरह मेरे लिए परिभाषित होते हैं। हर जगह हर परिस्थिति में। मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा कि उनसे नियमित मिला जाए। कई बार न मिल कर में उनके बीच में अधिक होता हूं। पिछले एक साल से यह स्थिति बनी है। कई बार मैं उनसे मिलने जाता हूं और डिपो चौराहे से यूटर्न लेकर वापस आॅफिस में बैठ जाता हूं।
आज में सोचता हूं कि विजय बहादुर सिंह सर से एक सीखा हुआ समय मैं किस प्रकार जी रहा हूं। मुझे जो मिलता उनसे, उसमें जिंदगी का हर पक्ष समाहित होता है। वह चाहे विचार हों, चाहे पक्ष या विपक्ष हो, समाज हो, परंपराएं हों या फिर लेखन हो, आज विजय बहादुर सिंह सब तरह से मेरे लिए एक व्यक्तित्व से अधिक पूरा परिवेश हैं। यहां परिवेश के रूप में वे जीवन के तमाम अनुशासन सिखाते हुए साथ होते हैं।
मेरा और विजय बहादुर सिंह का रिश्ता किसी शब्दिक परंपरा से परिभाषित नहीं होता, मेरा और उनका साथ होना एक दृष्टिकोण का निर्माण करता है।
आज मुझे लगता है कि मैं आज भी उनके साथ कई रूपों में साथ हूं। यह महसूस होना किसी भी संवाद के लिए एक जरूरी अनुशासन है।
विजय बहादुर सिंह मेरे दृष्टिकोण का निर्माण करने वाली प्रक्रिया के अभिभावक हैं। वे आलोचक अधिक हैं और मैं कवि अधिक हूं। कविता को समझने के प्रारंभिक दिनों में शब्द और अर्थ की कई परतें मैंने देखी हैं। कई साक्षात्कार किए हैं।
सर के लिए अनिवार्य शर्त है जिसे जीना है। अच्छे से जीना है। उनके लिए किसी की वैचारिक स्तर पर आलोचना करना, किसी के फरेब को नष्ट करना या उस पर हमला करना एक जरूरी प्रक्रिया है। वे मानवीय स्तर पर कुछ और सोच सकते हैं लेकिन वैचारिक स्तर पर हर किसी कवि या लेखक को नहीं बख्शते हैं। कविता पहचानने और उसमें निहित फरेब को पहचाना मैंने सर से सीखता रहा हूं।
क्योंकि वे कहते हैं कि आखिर चीजें एक परतीय नहीं होतीं। उनमें कई परतें होती हैं। इस निष्पत्ति के अनुसार कोई भी चीज एक पक्षीय नहीं हो सकती। इसमें विचार भी शामिल हैं। इस एक बात में हमारे कई दर्शन समाहित होते हैं। विजय बहादुर सिंह ने मेरे लिए लंबी यात्राएं रखीं।
मैं उनके कारण ही विविधता में चीजों को, विचारों और विचारधाराओं को देखना सीखा। जो लोग जीवन या विचारधारा को एक पक्षीय देखते हैं, वे विजय बहादुर सिंह के साथ नहीं रह सकते। क्यों? इसका कारण है वे आपकी चेतना को झकझोरते हैं, और यह बहुत कम लोगों को पसंद आता है। कई लोग बड़ी रुचि से मिलने जाते हैं और लौटते समय कहते हैं कि अरे विजय बहादुर सिंह तो बहुत मुश्किल व्यक्ति हैं। क्या मुश्किल हैं? क्योंकि वे आपके जड़ विचारों को हिला देते हैं।
ऐसा ही एक बार का उदाहरण है। दो युवा भोपाल से मिलने पहुंचे। उनमें से एक सरकारी इंजीनियर हो चुके थे और एक किसी आॅफिस में अधिकारी। दोनों साहित्य कविता में रुचि के चलते मिलने आए थे। विदिशा में विजय बहादुर वाली गली के उस घर में प्रवेश करते ही उनको अपने जूते उतारना पड़े। फिर मूंग की दाल, विदिशा वाला नमकीन और पुदीना वाली चने की दाल रिंगे ने उनकेसामने रखी। बहुत देर तक बातें होती रहीं। सर ने स्पष्ट कर दिया था कि मैं अभी कुछ नहीं खा सकता। वे इससे प्रभावित थे कि इतना स्वादिष्ट नमकीन में से डाक साहब कुछ नहीं खा रहे।
करीब तीस चालीस मिनट की बात हो चुकी थी। उस बात चीत में नमकीन भी खत्म हो रहा था लेकिन इतना खत्म नहीं हो पा रहा था कि प्लेटें साफ हो जाएं। उनमें जो नमकीन बचा है उसे पूरा खा लिया जाए। लेकिन उन युवाओं को लग रहा होगा कि प्लेटें पौंछ कर खा लीं तो अशिष्टता, और दूसरी तरफ सर को लग रहा था कि एक चम्मच नमकीन, दाल के कुछ दाने कचरे में फेंकने के लिए छोड़ना श्रम की कीमत का अपमान। बनाने वाले मजदूर की मेहनत का अपमान। अन्न का अपमान आदि।
उस समय मैं, श्रीकांत रिंगे और शैलेंद्र भावसार वहां थे। हम सर के सामने इन सब चरणों से निकल आए थे लेकिन वे दोनों युवा शिष्ट अधिकारी शायद अपने जीवन का, विजय बहादुर सिंह के सानिध्य में पहला चरण पार करने वाले थे।
बातचीत खत्म हो गई।
कुछ देर पहले जो बातचीत की जा रही थी उसमें कहा जा रहा था कि किसानों की समस्या क्या है? मजदूरों की समस्या क्या है? श्रम और पैसे का बंटबारा इतना असंगत क्यों होता जा रहा है।
उस समय किसानों और मजदूरों की बातें इस तरह होती थीं। आज तो इस तरह की बात करना आवश्यक नहीं समझा जाता, क्योंकि चमक-दमक में मजदूरों को सजा दिया गया है। कंपनी उनको ड्रेस देती है। बस अब लाखों करोड़ों युवाओं को 10 से बारह घंटे वातानुकूलित शो रूम अथवा मॉल में खड़े खड़े गुजारना होते हैं। या लाखों गार्ड दरवाजे पर   नीली-काली ड्रेस और टोप लगा कर खड़े रहते हैं। ये वो खेतीहर मजदूर हैं जो गांवों में ट्रैक्टर, थ्रेशर, हार्वेस्टर आने से बेरोजगार हुए। खेतों और खलिहानों से मानवीय श्रम  सिमट गया। खेतों की कटनई खत्म हो गई और वे सब शहर आ गए। आज उनको ही यहां खड़े रह कर प्रोडक्ट बेचना होते हैं। उनको महीने में मिलता है साढ़े पांच हजार, सात हजार या नौ हजार, किसी किसी को तेरह भी मिल जाता लेकिन किसी किसी को।
ये सजे धजे लाखों करोड़ों लड़के लड़कियां, मजदूरों, शोषित किसानों के समान ही हैं। इनके चेहरे कुपोषण से पिचके होते हैं। इनके चेहरे पर कोई भाव नहीं, बस एक रोबोट की तरह शो रूमों में, बड़ी दुकानों में, मॉल और स्टोरों में व्यस्त हैं।
ये सब शहर की झुग्गियों में रहते हैं। किसी सुविधाविहीन बस्ती के किसी मकान के एक कमरे में पांच लोग शेयर करके रहते हैं। उनको श्रम का पूरा हक नहीं मिलता।
कौन जिम्मेदार है? मध्यवर्ग को सपोर्ट करने वाली सरकारी नीतियां? लिजलिजे नीतिनिर्माता, जनप्रतिनिधि और सुरक्षित शोषण में लिप्त उच्च अधिकारी। शहरों में गांवों से आने वाले इस तरह के युवाओं का सिलसिला उस समय शुरु ही हुआ था लेकिन आज गांव शहरों की तरफ बाढ़ की तरफ आ रहा है और दूसरी तरफ देश का मध्यवर्ग सबसे लिजलिजे स्वरूप में फैल रहा है। नौकरीपेशा और व्यापार धंधे में मस्त इस वर्ग को देश की कोई चिंता नहीं है। यह समस्याओं पर बहुत गंभीरता से विचार नहीं करता। यह पूरा वर्ग भेड़चाल में यकीन करता है। एक सुरक्षित और खोल में बंद जीवन बिताता है। आदि आदि। गांव के ये युवा कुछ सालों बाद मध्यवर्ग के रूप में जड़ों से कटे हुए एक परिवार के रूप में शहर की सबसे पिछड़ी बस्ती का हिस्सा हो जाता है।
इस लंबी बातचीत का अंत अभी बाकी है।
दोनों युवा अधिकारी जाने के लिए तत्पर हो रहे थे। फिर आपसे मिलेंगे, हम आपको रचनाएं दिखाएंगे जैसे अंतिम चरण के संवाद कर रहे थे।
तभी सर की नजर उन प्लेटों पर पड़ी। करीब चार चम्मच नमकीन बचा होगा। उसमें अंकुरित मूंग भी थी। सर ने उनसे पूछा- क्या आप दोनों को श्रम के सम्मान का अर्थ पता है? वो एक दम हक्का बक्का और उठते-उठते बैठ गए। कुछ क्षण के बाद झिझकते  हुए  उन्होंने कहा-‘ नहीं डाक साब।’
ये जो आप प्लेट में नमकीन छोड़ कर जा रहे हैं। वह कचरे में चला जाएगा। क्या कोई किसान इतना अन्न इस तरह प्लेट में छोड़ सकता है? वह जानता है कि उसका एक दाना कितने श्रम से पैदा होता है। कितनी मेहनत के बाद वह खाने लायक का सृजन कर पाता है। इसीलिए किसानों को देखिए एक एक दाना बीनता है। हम इस तरह इसलिए छोड़ देते हैं कि हम उसके श्रम की पूरी कीमत नहीं चुकाते।
आपको ये सब पूरा खाना चाहिए। एक प्लेट को मैंने उठा कर, उसकी अंकुरित मूंग के कुछ दाने हथेली पर रख कर खा लिए। इसके बाद दोनों ने आहिस्ता से चम्मच से नमकीन के संपूर्ण कणों को सहेज लिया। बात जाने की हुई। दोनों उठे और सर की और पांव लागू करने लगे। फिर जूते पहने और दरवाजे के बाहर खड़े होकर कुछ और बातचीत।
मैं भी उनके ही साथ अपने रुम पर बाहर जाने के लिए बाहर निकल लिया। मैं सर से जाने के लिए नहीं पूछता था। मैं उनकी आंखों में देखता और वे मेरी बॉडीलैंग्वेज से समझ जाते थे कि अब मुझे जाना है। वे या तो बोलते ठीक है तुम जाओ। जो बातें हुई हैं उन पर विचार करना। या फिर सिर हिला देते, उसका मतलब भी यही होता ठीक है जाओ।
 मैं उनके पीछे गली के मोड़ पर आ गया था। वे आपस में बतिया रहे थे, साला ये कोई बात है प्लेटें खाली करवा लीं। ये तो इंसल्ट है। उन्होंने मुझे देखा और फिर वे दूर चले गए।
सर ने मुझसे आज तक नहीं पूछा कि वे बाद में क्या कह रहे थे और न मैंने कभी इसकी चर्चा की। मैंने उनको कभी फिर सर के यहां नहीं देखा।
सर का यह जो शिक्षण है, यह कमाल का है। बार बार सर के घर या उनसे मिलने वालों ने ऐसे कई चरण पार किए हैं।

रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति
101, आरएमपी नगर, फेस- 1, विदिशा मप्र
9826782660


सोमवार, जुलाई 30, 2012

बता मैं सड़क की तरफ क्यों देखती हूं

      वह कली और फूल के बीच में कहीं रहती थी। उसका चेहरा फूलों और कलियों के बीच की सुंदरता में कहीं महकता था। जैसे ईश्वर ने उसे बनाते हुए यथार्थ के साथ थोड़ी सी कल्पना डाल दी थी। आंखों ओठों और गालों पर वैसी ही सुख फैला रहता जैसा फूलों से भरी शाख के चारों तरफ होता। उसे मैं तो मित्रो कहता था। मगर मेरे दोस्त- ‘यार क्या कली है!’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते थे। उनके संबोधन से मैं अंदर से ंिचंतित हो जाता था मगर शिकायत नहीं करता था। हमारी तिकड़ी चौकड़ी में मनोज भी था। उसका विचार अलग था। वह कहता था कि यह लड़की मेंटली रिटार्टिड है। क्योंकि यह छत पर गमलों के बीच बिना हिले खड़ी रहती है। मनोज ने उसके बारे में एक गप भी सुना दी कि एक दिन मैंने उसे गमले में उगी हुई लड़की की तरह देखा। उसके बालों से पानी के मोती टपक रहे थे, जैसे उस पर किसी ने देवी समझ कर जल चढ़ाया हो...
हम तीनों चारों दोस्त अक्सर सुबह उठते और नौ बजे तक गली के मोड़ पर खड़े हो जाते थे।
करने को कुछ था नहीं। पढ़ाई सरकारी कामकाज की तरह चलती थी। सबको पता था कि कालेज द्वारा एवेलेबल नोट्स होने की शर्त पर परीक्षा की जंग जीत जाएंगे। हम पैरोडी भी बनाते थे-
जीत जाएंगे हम... जीत जाएंगे हम, नोट्स अगर संग हैं...
     दीपेश ने बीच में टांग अड़ा दी। यार पहले उस लड़की के बारे में कुछ बात करो। यार वह एकदम सनफ्लावर है। उसने बताया कि पिछले मंथ उसने सनफ्लावर के खेत देखे थे। उसने बताया कि वह सनफ्लावर की तरह है। उसे छत पर सुबह की धूप में चेहरा झुकाए, बालों को लहराकर सुखाते हुए देखा था। मैंने अपना गुस्सा उतारते हुए कई सारी कल्पनाएं उन पर डाल दीं। वह गुस्सा होती तो मई की धूप का टुकड़ा लगती। सुबह छत पर जाती तब दोनों ओर गमलों की बीच महकती तुलसी की तरह लगती। उदास होती तो शाम के धुंधलके में घिरा हुआ फूल हो जाती।
यह बहुत पुरानी बात है। जब हम पढ़ रहे थे और दुनिया के बारे में कुछ नहीं जानते थे। जो जानते थे वह इतना था कि हमें एक अच्छी दोस्ती की जिंदगीभर जरूरत रहेगी। यह दोस्ती एक लड़की से भी हो सकती है और लड़के से भी।
    अब मित्रो इस दुनिया में नहीं है। उसकी कहानी आज भी दुनिया में बह रही है। जब कोई इस दुनिया से कहीं चला जाता है तो उसकी कहानी खत्म नहीं हो जाती। क्योंकि इंसान चला जाता है लेकिन उसके बारे में सोचने वाले लोगों में उस आदमी की कहानी जिंदा रहती है। मित्रों की कहानी भी हमारे बारे बीच में जिंदा थी। 
    हम दोस्त उसके बारे में ऐसे बातें करते थे जैसे उसके बारे में सब कुछ जानते हैं। मित्रो कस्बे की लड़की थी। जैसे छोटे शहर होते हैं। छोटे शहर में एक मेन सड़क होती है। शहर की गलियां मेन सड़क को सहेलियों की तरह घेरे रहती हैं। छोटी गली के बाशिंदे बड़ी गली की उपमा देकर अपने आप पर ताना कसते हैं कि वो गली कितनी अच्छी है। बड़ी गली के लोग मुख्य सड़क के लिए कहते हैं सबकुछ उसी सड़क के किनारे है। छोटे शहर के लोग बड़े शहरों की सड़क़ों व भवनों की साफ सफाई और अपने शहर की नेतागिरी को तुच्छ ठहराते हुए जीते हैं।
    मित्रो यह सब कुछ नहीं करती थी लेकिन वह किताबों कहानियों ओर टीवी सीरियलों को देख कर अपने घर की तुलना करती थी। वह माता पिता घर कुटुम्ब गली और अपने आपको कम या ज्यादा ठहराती। उसका कुल मकसद यह था कि उसे और उसकी सहेलियों को कोई बड़े शहरों की लड़कियों से कम करके क्यों आंकता है। मित्रो नाराज होकर अपनी मम्मी से कहती-‘हओ ! तुम्हारे जैसो कोई नहीं करै मम्मी। तुम जरा जरा सी बातें लै कै..... अन्वि की मम्मी बिलकुल टोका टाकी नहीं करें।’ मम्मी दहाड़ती-‘देख तू मेरी सरीगत किसी अन्वि की मम्मी से मत करू कर। तू हमें तो पागल समझती है। हम तेरे भले के लिए टोकते हैं।’
        ‘हमें ऐसो भलो नहीं चाहिए। ‘मित्रो के चेहरे पर कड़वाहट की परत चढ़ जाती थी। मां बेटी दो दिशाओं की तरह एक घर में घूमने लगती थीं। कुछ देर में विभाजन स्वत: मिट जाता जैसे दो कमरों की हवा दरवाजा खुलने के बाद एक हो जाती है। शाम होते ही मित्रो छत पर आ जाती । कमरे की तरह दिन की घुटन को हटाने के लिए खुली छत पर गहरी सांसों को सीने में भरती। उसकी सहेली सिमी ने एक दिन टोका था-‘ऐसी सांसें लेती है जैसे दूसरे दिन के लिए भर रही है।’ मित्रो कहती-‘ताजी हवा है न।’ सिमी कहती ‘कल बंद थोड़ी हो जाएगी।’ मित्रो कोई उत्तर नहीं देती बल्कि सूरज को एक टक देखने लगती। ‘क्या हो गया।’ सिमी टोकती। मित्रो पूछती -‘बता मैं सड़क के तरफ क्यों देखती हूं।’ सिमी चैंक जाती। वह सम्हल कर बोली-ह्यह्यकिसी का इंतजार है।’ मित्रो सुनते ही हंसने लगी-‘तुम भी यार क्या.... प्यार प्यार मुझे चिढ़ होने लगी है। अच्छे कपड़े पहनो तो हर कोई यही कहता है-प्यार करने लगी होगी। कुछ नया करो तो लोगों का अन्दाज प्यार से बाहर निकलता ही नहीं।’
    ‘प्यार से बाहर कोई निकले कैसे, घर से बाहर निकलें और निकलने दें तब न। ज्यादा से ज्यादा यहीं छत पर आ सकते हो। मैं अपने घर से तेरे घर पर ही तो आ सकती हंू। मैं और तू यहां से बाहर कहीं गए हैं क्या। चाहे वो एन.सी.सी का कैंप हो पिकनिक हो या कहीं भी... देश दुनिया देखने को मिले तो प्यार की बातें छूटे। ‘रहने दे अब ज्यादा मत झाड़ ।  तू समझदार हो गई है।   मित्रो हंसी थी।  ‘हां एक दिन मैं सोच रही थी- अपने यहां के लोग कहीं घूमने नहीं जाते ओैर न जाने देते। ज्यादा से ज्यादा आसपास की शादियों में खाना खाने जरूर चले जाते हैं।’ मित्रो सड़क को देख रही थी। मित्रो सड़क देख रही थी। सिमी ने मित्रो को बीच में खींचा। ठोड़ी पकड़ कर पूछा-ह्यह्ययार ये क्या है। ये मैं आज ही नहीं कई बार देख चुकी हूं। तू बोलते हुए बात करते हुए सड़क ही क्यों देखती है। थोड़ी देर पहले तूने पूछा था अब मैं तुझसे पूछ रही हूं कि तू सड़क क्यों देखती है। ‘तुझे नीचे चलना है।’ मित्रो ने स्थिर स्वर में कहा। ‘मुझे नीचे नहीं चलना है लेकिन ये है  कि तू किसका इंतजार करती है। बताती भी नहीं।’
    ‘मैं इंतजार तो करती हूं लेकिन किसी प्यार करने वाले का नहीं। मैं जिसका इंजार करती हूं वह इस सड़क से कभी नहीं गुजरा। ज्यादा नहीे कुछ दिनों से उसकी याद ज्यादा आ रही है। इस छत पर आकर मुझे चैन मिलता हैं। सड़क को देखने से भरोसा आता है। जानती है क्यों, इसलिए कि सड़क पर हर चीज चलती हुई दिखती है।’  सिमी आंखें फाड़ कर उसे देखने लगी थी। उसकी आंखें सिकुड़ गईं।-‘तू पागल हो गई। क्या हो गया तुझे.. क्या अनजानी बातें करने लगी।’ सिमी दोनों हाथ उसके कंधों पर रख कर देर तक मि़त्रों की आंखों में ताकती रही। जैसे वह उसके इंतजार करने वाले की  शक्ल उसकी आंखों में खोजना चाहती थी। ‘तू समझी नहीं।’ मित्रो ने सिमी के हाथों को अपने कंधों से हटाया-‘एक बार और तुझे समझाती हूं- जब मैं छोटी थी...’ ‘अब क्या बड़ी हो गई...’ सिमी दादी की तरह बीच में बोली।
    ‘...अरे यार ... मेरा मतलब अब से छोटी थी... नानी ने इसी छत पर एक कहानी सुनाई थी। वह थी तो कुछ भी नहीं पर तू सुन ले कि हम दोनों यहां थें। सब लोग टीवी देख रहे थे। चांद खिला हुआ था। आसमान में इक्का दुक्का तारे बच्चों की तरह चमक रहे थे। उधमी बच्चों की तरह वे चांद से बहुत दूर थे। चांद के चारों तरफ धुधला सा एक घेरा था। मैंनें पूछा कि नानी चांद ऐसा क्यों है तो उसने बताया कि वह तुझे देख कर हंस रहा है। नानी ने एक कहानी सुनाई उसमें कुछ भी नहीं था- बस एक लड़का था। वो लड़का बहुत दूर से यहां आ रहा था। उसे हर इंसान प्यार करता था। वो एक राजकुमार था। वह यहां आएगा। इसी सड़क से गुजरेगा। तुझे प्यार करेगा और आसमानों में तुझे ले जाएगा।  मैने नानी से पूछा वह कब आएगा? नानी ने कहा- आता होगा एक दो दिन में...
     दो दिन बाद मैंने पूछा तो नानी ने कहा-‘अपन ने कल जो फिल्म देखी थी । वह तो उसमें मर गया। ‘मैंने नानी से कहा-ह्यपर नानी मुझे तो उसकी याद आने लगी है।’ नानी ने कहा यह तो बहुत अच्छा है। अब तू उसका इंतजार कर वह जरूर आएगा। नानी यहां से चली गई। मैंने उससे फोन पर कहा ह्यह्यआप तो मुझे वह लड़का दो आपने मुझे ऐसी कहानी क्यो सुनाई। वह लड़का फिल्म में क्यों मर गया। क्या अच्छे लड़के इस तरह क्यों मर जाते है। तो वो बोलीं-‘एक लड़का और है वह बिलकुल साधारण है लेकिन उसे पहचानना मुश्किल है। अब ये मैं उसके बारे में नहीं जानती कि कब वह इस सड़क पर से निकलता है। तुझे चाहिए तो तू रोज देख... कुछ दिनों में तुझे उसकी पहचान आ जाएगी।
    नानी को मैंने फिर फोन लगाया तो उन्होंने कहा कि उनको बुखार आ रहा है. जल्दी ही भगवान उनके लिए आसमान से सीढ़ियां भेज रहा है। एक दिन मम्मी खूब जोर से रोने लगीं। किसी ने मुझे बताया कि तेरी नानी उपर चली गई। मुझे उनकी सीढ़ियों की बात याद आने लगी। मैंने सपने में बहुत लम्मी सीढ़ी देखी जिस पर नानी उपर जा रही हैं। मैं उनको आवाज दे रही हूं लेकिन वे नहीं सुन रही हैं।
        ‘अरे तो पगलाती क्यों है। परीक्षा की तैयारी कर।’
        ‘लेकिन मुझे उसकी बहुत याद आती है।.. नानी ने कहा था जिस दिन वह लड़का तुझे मिल जाएगा। उस दिन से मम्मी तुझे डांटना बंद कर देंगी। खूब घूमने जाने देगीं। पापा की पे बढ़ जाएगी। घर के कोने रोशनी से भर जाएंगे। सड़कें और गलियां साफ सुन्दर हो जाएंगी। झुग्गियों की जगह महल बन जाएंगे। लोगों की गरीबी दूर हो जाएगी। आसमान सात रंगों का दिखने लगेगा। तू ओर तेरी सहेलियां और खूबसूरत हो जाएंगी। लेकिन नानी ने कहा था तू उससे प्यार नहीं कर सकती। मैं सच में उससे प्यार नहीं करूंगी।’ सिमी आंखें फाड़ कर उसका मुंह देखे जा रही थी। इससे पहले तो उसने मित्रो के बारे में इतना तो नहीं सोचा था। यह कैसी हो गई है। मित्रो बोल रही थी-‘सिमी वह मुझे नहीं दिखा तो मैं जल्दी ही नीचे गलियों और सड़कों पर खोजने उतर जाउंगी.....’
एक दिन ऐसा हुआ। मित्रोे बिना बताए कहीं चली गई.... उसके दोस्त और उसकी सहेलियां उसे आज भी उस कस्बे में इंतजार कर रहे हैं। 

समाप्त


रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति
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