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सोमवार, अगस्त 27, 2012

बैंक हड़ताल क्यों?


हड़ताल अपनी बात रखने का पुराना तरीका है। आज यह उतना कारगर नहीं रहा। लेकिन आधुनिक आर्थिक-प्रगति के प्रवाह में कई ऐसे मोड़ आ रहे हैं जिसमें कर्मचारियों के हित टकरा रहे हैं। 

   पूरे भारत में सार्वजनिक क्षेत्रों के लगभग 10 लाख कर्मचारी बैंकिंग अमेंडमेंट बिल के खिलाफ हड़ताल कर रहे हैं। द यूनाइटेड फोरम आॅफ बैंक यूनियन के बैनर तले बैंक कर्मचारियों की यह हड़ताल केंद्र सरकार के उन सुधार-प्रस्तावों के खिलाफ है जिनसे बैंकिंग उद्योग में विदेशी और निजी पूंजी का आना आसान हो सकता है। यूनियन के नेताओं ने भी अपना पक्ष रखा है। उनका कहना है कि बैंकिंग नियमन अधिनियम 1949 और बैंकिंग कम्पनीज एक्वीजीशन एंड ट्रांसफर आॅफ अंडरटेकिंग्स अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव है। सरकार बैंकिंग अधिनियम 1949 की छाया में अपना काम करे। बैंक कर्मचारी बैंकों में निजी और विदेशी पूंजी को अनुमति देने और निजी कम्पनियों को नए बैंक शुरू करने के लिए लाइसेंस देने के प्रावधान का भी विरोध कर रहे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि नौकरियों की आउटसोर्सिग नहीं होनी चाहिए, ग्रामीण शाखाओं को बंद करने से रोका जाए और खंडेलवाल समिति की सिफारिशें एक तरफा लागू न की जाएं।
इस हड़ताल से सरकारी बैंकों की देश भर में 70 हजार से अधिक शाखाएं प्रभावित हैं। देश के 27 सरकारी बैंकों के अलावा कुछ निजी और विदेशी बैंक भी हड़ताल में शामिल हैं। बैंक कर्मचारियों-अधिकारियों के संगठन आॅल इंडिया बैंक इम्प्लाईज एसोसिएशन के सचिव विश्वास उटागी के रुख से लगता है कि वे आरपार की लड़ाई लड़ना चाहते हैं। उनका कहना है कि हड़ताल को स्थगित करने का कोई सवाल नहीं है। जब तक वित्त मंत्री यह आश्वासन नहीं देते कि यह बिल पेश नहीं किया जाएगा। कर्मचारी संघ बैंकिंग कानून विधेयक में संशोधन के लिए सरकार का विरोध करता रहेगा।
दूसरी तरफ देखें तो आज बैंक एक अनिवार्य सेवा की तरह हो चुकी है। आज हम अर्थ व्यवस्था के करेंसी और प्लास्टिक मनी के युग में जी रहे हैं। जहां हर कदम पर बैंक का सहयोग जरूरी है। बैंक यूनियनों का कहना है कि जब पूरे देश में बैंकिंग कारोबार ठीक चल रहा है तो केंद्र सरकार बैंकों के पीछे क्यों पड़ी है? लेकिन क्या सच में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक पूरी क्षमता से काम कर रहे हैं? क्या उनसे देश को संपूर्ण लाभ मिल पा रहा है? क्या उनमें कागजी कार्रवाई अधिक नहीं है? आज सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक सरकारी दफ्तरों की तरह नहीं चलते हैं? क्या सरकार द्वारा बैंक ों की भूमिका का विस्तार करना गलत है? सरकार की पूरी तैयारी है कि बैंकिंग अमेंडमेंट बिल जल्द ही संसद में पास हो। इस बिल के पास होने के बाद सरकारी बैंकों का निजीकरण किया जा सकेगा। साथ ही कॉर्पोरेट सेक्टर भी बैंकों की शुरुआत कर सकेंगे। बैंकिंग अमेंडमेंट बिल की मदद से बैंकिंग सेक्टर में कॉर्पोरेट और विदेशी पूंजी आसानी से आ सकगी। कुल मिला कर सरकारी बैंकों को अब चुनौती के साथ प्रतियोगिता भी करना ही होगी। सरकार का रुख कुछ दिनों में स्पष्ट हो जाएगा। इस मामले में बीच का रास्ता निकाला जाए तो सभी के लिए बेहतर होगा।  कोई भी हड़ताल विकास की गति को नहीं रोक सकती।