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मंगलवार, जनवरी 22, 2013

हिंदू आतंकवाद संबंधी बयान

 


केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के बयान में निहित देश के राजनीतिक रंग देखे जा सकते हैं। उनका बयान राजनीतिक होकर सरलीकृत कटु राजनीति का संकेत भी है।


कें द्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के हिंदू आतंकवाद संबंधी बयान देने के बाद देश की राजनीति चूने की बाल्टी की तरह उबलने लगी।  जयपुर के  कांग्रेस चिंतन शिविर को संबोधित करते हुए शिंदे ने कहा था कि भाजपा और संघ देश में भगवा आतंकवाद फैलाने के लिए ‘आतंकी प्रशिक्षण शिविर’ चला रहे हैं। यह भी बताया कि, ‘जांच के दौरान यह रिपोर्ट आई है कि बीजेपी और संघ आतंकवाद फैलाने के लिए आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर चला रहे हैं। समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद में बम लगाए जाते हैं और मालेगांव में भी बम विस्फोट होता है।’ हालांकि बाद में अपने बयान से मुकर भी गए कि ‘यह भगवा आतंकवाद है जिसकी मैं बात करता हूं। यह कई बार मीडिया में आ चुका है। इसमें कुछ नया नहीं है।’
बयान देने और फिर मुकरने की इस राजनीति ने ‘राजनीतिक-स्तर’ की ओर भी इशारा किया है। राजनीति के गिरते हालातों से यह भी पता चलता है कि कांग्रेस के सिपहसालार कहीं न कहीं सकारात्मक और सृजनशीलता की जगह विखंडन की राजनीति को अपना हथियार आज भी बनाए हुए हैं। दिग्विजय सिंह भी इस तरह के बयानों के लिए जाने जाते हैं। ये बयान देश की गरिमा और लोकतंत्र को संबोधित न होकर, विखंडन की ओर इशारा करते हैं। आज देश का लोकतंत्र विकसित हो रहा है। उसमें प्रतिरोध के स्वर भी आ रहे हैं। ऐसे में जनता को सरलीकृत बयानों से नहीं भरमाया जा सकता।  इस बयान में जो निहित था, वह राजनीतिक दल अपनी प्रतिक्रिया में बता रहे हैं। क्या गृहमंत्री की राजनीतिक सोच में ये विचार नहीं पैदा हुआ कि इस तरह के सरलीकृत बयानों से वे करोड़ों लोगों को कहीं न कहीं मानसिक आघात पहुंचा सकते हैं। यह बयान न कहते हुए भी वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा है। आज देश को वोट बैंक की राजनीति से उबारने की आवश्यकता है। इस बयान के प्रतिप्रश्न पर संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने भी बयान दिया है कि गृहमंत्री को हिंदू आतंकवाद शब्द का प्रयोग करना अत्यंत अनुचित और आपत्तिजनक है। आतंकवाद आतंकवाद है, उसे हिंदू या अन्य किसी धर्म के साथ जोड़ना उचित नहीं है। उन्होंने हाल ही में दिए गए अकबरुद्दीन ओवैसी के देश विरोधी बयान का भी उल्लेख किया। ओवैसी के खिलाफ पुख्ता सबूत होने के बाद भी सरकार करवाई करने से कतरा रही थी। जनता के दबाव और न्यायालय के आदेश के बाद उन्हें करवाई करनी पड़ी। यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि इस बयान के कुछ आधार तंतु कुछ घटनाओं की जांच में आए हैं जिनका उल्लेख बयान में किया गया है। लेकिन यहां यह भी कहना जरूरी है कि आतंक से भगवा रंग, हिंदू या मुसलमान को जोड़कर एक ब्रांड बनाने का मतलब एक नए तरीके का खतरनाक राजनीतिक प्रयोग है। किसी भी तरह का आतंक देश में स्वीकार नहीं किया जा सकता। महत्वपूर्ण है कि हम अपनी राजनीति को सकारात्मक और सर्वसमावेशी बनाएं। आतंक को किसी रंग या जाति-धर्म से जोड़ने का काम नेता करते रहे हैं लेकिन आज इसे बंद karne ki आवश्यकता है।

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एमपी एक्सपोर्ट मीट

दुनिया में आर्थिक गतिविधियां केंद्र में हैं। राजनीतिक सामाजिक क्षेत्र की गतिशीलता भी इन पर निर्भर करती है। मध्यप्रदेश सरकार की ओर से हाल ही के वर्षों में निवेश के लिए संगठित और व्यवस्थित प्रयास किए जा रहे हैं। पिछले दिनों इंदौर में इस तरह के प्रयासों को देखा गया है। ग्वालियर में शुरू हुई चौथी एमपी एक्सपोर्ट का रविवार को आशाओं से भरा समापन हो गया है। ये चौथी एमपी-एक्सपोर्ट मीट थी। ग्वालियर के एक्सपोर्ट फैसिलिटेशन सेंटर में आयोजित हुई इस रिवर्स बायर सेलर मीट में लगभग 629 करोड़ के 62 व्यवसायिक अनुबंध हुए। इसमें ग्वालियर-चंबल अंचल के उत्पादकों ने182 करोड़ रूपए से अधिक के अनुबंध हासिल किए हैं। इस आयोजन में 16 राष्ट्रों के राजदूत, उच्चायुक्त एवं अन्य राजनयिकों ने हिस्सा लिया। इस मीट में लगभग दो दर्जन देशों के करीबन 75 खरीददार आए थे। इसमें ग्वालियर चंबल अंचल सहित प्रदेशभर के 110 उद्यमियों ने अपने-अपने उत्पादों को प्रदर्शित किया था। ये अनुबंध तत्काल कोई लाभ को प्रदर्शित न करते हों लेकिन ये दूरगामी व्यावसायिक सफलताओं की आधारशिला बनते हैं। ऐसा भी होता है कि कुछ अनुबंध पूरे नहीं हो पाते। हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए और कोशिश करना चाहिए कि हम इन अनुबंधों को हासिल करें। करार पूरे नहीं होने पर राजनीतिक शोर करने की अपेक्षा हमें कारणों की तह में जाना जरूरी है।
मध्यप्रदेश के चंबल संभाग के कई विक्रताओं ने तो विदेशी कंपनी के साथ अपने अनुबंध को एक दूर का सितारा ही समझा था लेकिन इस मेले में कई कंपनिया ने ऐसे विदेशी अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए हैं। साथ ही सुदूर देशों से आए राजनयिक, आयातक व खरीददारों को प्रदेश के उत्कृष्ट उत्पादों ने खूब रिझाया और वे करारनामों को अंजाम देकर अपने देश लौटे। यह मीट मध्यप्रदेश सरकार द्वारा भारत सरकार एवं सीआईआई आदि के सहयोग से आयोजित की गई थी। लगभग दो दर्जन देशों से आए आयातकों व खरीददारों ने एमपी एक्सपोर्टेक के आखिरी दिन भी प्रदेश के उत्पादों को पसंद किया। यह भी उल्लेखनीय है कि 18 जनवरी से पिछली मीट की तुलना में छ: गुने करारनामे हुए। प्रदेश सरकार ने 2008 में प्रदेश के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमियों को विश्व बाजार मुहैया कराने के लिये एमपी-एक्सपोर्ट के रूप में की गई पहल आज नए करारों की ओर अग्रसर है। इंदौर में हुई पिछली एमपी एक्सपोर्टेक की तुलना में इस बार ग्वालियर में हुई मीट में लगभग छ: गुने अनुबंध हुए हैं। इससे जाहिर होता है कि मध्यप्रदेश के उत्कृष्ट उत्पादों ने दुनिया का ध्यान खींचा है। इसमें उल्लेखनीय बात ये है कि मध्यप्रदेश सरकार ने छोटे-छोटे उद्यमियों के लिए एमपी एक्सपोर्टेक के रूप में एक बेहतर प्लेटफॉर्म मुहैया कराया है। ये सारी चीजें ही मिलकर किसी व्यवसाय को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय होने का मार्ग प्रशस्त करती हैं। प्रदेश की आर्थिक नीतियों की दशा और दिशा को नए तरीके से संयोजित किया जा रहा है। यह संयोजन ही भविष्य में निर्मित होने वाले आर्थिक महापथ का निर्माण करेगा।