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मंगलवार, दिसंबर 10, 2013

कांग्रेस की हार

 


डीजल की कीमतों के बाद जब रोज की चीजें महंगी होने लगीं तो ग्राहक ने पूछा दाम क्यों बढ़े? दुकानदार ने कहा- डीजल बढ़ गया है। ग्राहक ने पूछा- डीजल किसने बढ़ाया तो उत्तर ‘कांग्रेस’ था। 

अ   ब चुनावों के नतीजों के बाद सिर्फ विचार और विश्लेषण ही बाकी बचा है। यह  काम तभी आता है जब उसे अमल में लाया जाए। इस तरह कांग्रेस की हार की कहानी बहुत पहले शुरू हो चुकी थी। जब कुछ महीने पहले हिसार लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस के खिलाफ 4-0 का नतीजा आया। एक उम्मीदवार की जमानत जब्त हो गई थी। यह एक कठोर संदेश था। लेकिन किसी ने यह पूछना आवश्यक नहीं समझा कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? जनता इतनी नाराज क्यों है? इस घटना के बाद भी कांग्रेस कंपनियों को घाटे से बचाने के नाम पर हर हफ्ते डीजल और पैट्रोल की कीमतें बढ़ाने में लगी रही। डीजल की मामूली बढ़ोतरी ने खुदरा बाजार ने सामान्य चीजों की कीमतों को बढ़ाने की खुली छूट ले ली। कीमतें बढ़ने के बाद घटी नहीं। भले ही उनकी कीमतें थोक बाजार में घट गर्इं। थोक आंकड़ों में कीमतें कम-ज्यादा होती रहीं, लेकिन जनता को राहत नहीं मिल रही थी। कीमतों की बढ़ोतरी का सारा गुस्सा लोगों ने डीजल पैट्रोल पर निकाला। कांग्रेस महासचिव बीके हरिप्रसाद का कहना था कि हार अप्रत्याशित नहीं थी, जबकि पार्टी के उम्मीदवार की हिसार में जमानत जब्त हो गई थी। इसी समय टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि हिसार का नतीजा जन लोकपाल विधेयक पर एक जनमत संग्रह है।
 केंद्र सरकार द्वारा आर्थिक सुधारों के नाम पर सृजित महंगाई को चुनाव में महंगाई और भ्रष्टाचार प्रमुख मुद्दे थे। एक प्रमुख नारा था-पेट्रोल महंगा, डीजल महंगा लेकिन भ्रष्टाचार सस्ता। कांग्रेसी नेताओं के पास इस चुनाव के दौरान भ्रष्टाचार दलील नहीं थी। कांग्रेस के पास राहुल गांधी के रूप में एक केंद्रीय शक्ति को सृजित करने वाला चेहरा था लेकिन वे जनता को एक सख्त और ताकतवर शासक की तरह आकर्षित नहीं कर सके। लोग कहने लगे कि राहुल अपनी पार्टी के बड़े नेताओं के पढ़ाने पर वही बोलते हैं जो उन्हें कहा जाता है। अन्ना के उस विशाल जन समर्थन को राहुल और उनकी पार्टी समझ ही नहीं सकी। इसके अलावा कांग्रेस पार्टी अपने पुराने वैचारिक नारों का ही इस्तेमाल करती रही जैसे कि भाजपा सांप्रदायिक है, जबकि भाजपा ने अपने आपको बदला है। मध्यप्रदेश इसका उदाहरण है। कांग्रेस की हार का एक कारण यह भी है कि उसके पास एकसूत्रता की कमी थी।  नेतृत्व में एक स्पार्क होना चाहिए वह कहीं दिखाई नहीं दिया। युवा नेतृत्व युवा और पहली बार मतदान कर रहे लोगों को आकर्षित नहीं कर सके। कांग्रेस के पास ऊर्जा नहीं थी।  सरकार व संगठन दोनों जीत के मुगालते में रहे। कांग्रेस नेता समझ ही नहीं पाए कि महंगाई व भ्रष्टाचार के अभियान में दम है। महंगाई से तो जनता जूझ ही रही है, उस पर से भ्रष्टाचार ने खाज का काम किया। चुनाव से पहले पेट्रोल व डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की बातें होती रहीं। मजदूर किसान एवं नौजवान सभी परेशान रहे। प्रधानमंत्री पद पर हैं लेकिन सत्ता में नहीं हैं। इसी राजनीतिक सच्चाई के कारण पार्टी दिशाहीन होती चली गई और एक हारी हुई पार्टी बन गई।

रविवार, अक्टूबर 27, 2013

गांव से एक दिन......... कविताएं


 
रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति

   
आत्मकथ्य
मेरे लिए अपने आपको गांव या शहर में किसी भी रूप में बांटना मुश्किल होता है। खुद को और कविता को बांटना मेरे लिए संभव नहीं होता है। मैं समझ नहीं पाता कि वह कौन सी सीमा रेखा है जिससे समाज अलग अलग होता है। हम सुविधाओं के लिए खुद को अलग अलग सीमाओं में बांटते हैं लेकिन दरअसल वे कोई सीमा होती नहीं हैं। वे एक ऐसा बिंदु होती हैं जिसको हम सुविधा के लिए स्वीकार करते हैं। यहीं दूसरी बात ये है कि आखिर मैं क्यों नहीं बांट पाता? क्या कारण हैं कि ऐसा है? यहां अपनी बात एक उदाहरण से स्पष्ट करना जरूरी है। विज्ञान के नजरिये से देखें तो अंधेरा और उजाला कोई दो स्थितियों या पक्षों का प्रतीक नहीं हैं। वे प्रकाश कणों की विरलता और सघनता का स्तर ही होते हैं। जब बहुत अधिक प्रकाश कण होते हैं तो दिन होता है और जब वे धीरे धीरे कम होते जाते हैं, उनमें विरलता आती जाती है तो वे अंधेरे का निर्माण का भ्रम देते हैं। यानी स्केल एक ही होता है। अब जब स्केल एक है पैमाना एक है तो आप उसे दो अलग पक्ष जब करेंगे तो एक सुविधा के लिए करेंगे। यह सुविधा प्रशासन के लिए ठीक है कि रात हो गई तो लाइट की व्वस्था की जाए। या शहर से बाहर जंगल या गांव आ गए है तो विशेष चौकी की स्थापनाएं की जाएं लेकिन ये कविताओं के लिए भाव के लिए संभव नहीं हैं। कम से कम मैं अपनी जिम्मेदारी पर स्वीकार करता हूं कि मेरे लिए यह अलगाव स्वीकार नहीं.... यही कारण है कि मैं गांव को सभ्यता के स्केल के निम्मतम हिस्सों से उच्चतर हिस्सों की ओर आने वाले वर्ग की तरह देखता हूं।

1
गांव से एक दिन

मैं गांव में था तो सिर्फ गांव में नहीं था
कुछ गांव भी मुझमें था

चीजें सिर्फ गांव के मेढ़े तक नहीं थीं
कुछ इस तरफ और कुछ उस तरफ थीं
शहर सपनों की चादर में चिपक कर आता रहा
मैं शहर और गांव दोनों में खुद का जीता रहा

एक बस आती थी-धूल का बादल लिए
वह पहला गुब्बारा था जो शहर से गांव आया
उसी में कुछ हवाएं कुछ कल्पनाएं आती थीं
शहर कैसा होता है न जाने कितने किस्सों के साथ

जब मैंने शहर नहीं देखा था, पर शहर था
देखे थे रंगीन जगमगाते दृश्य
यह शहर टीवी की स्क्रीन से उतरा था
गांव के लड़कों के दिमाग में जाकर छुप गया था

गांव के आंगन में शहर आता था
बस में रखा थैला बन कर
बिस्कुट का एक पैकिट और कुछ खिलौने साथ
शहर में सब कुछ क्यों होता है?

आज सोचता हूं
मेरा गांव धीरे-धीरे शहर से चिपक रहा है
मैं एक नक्शे की तरह दोनों में दर्ज




2
पुल से लिपट कर रोती नदी

पुल बना और गांव सुंदर हुआ
नदी सूखी तो गांव ने इधर-उधर देखा
यह अचानक सब नहीं हुआ था लेकि न
उत्तर किसी के पास नहीं था

मेरे गांव के लोगों के लिए
कुछ मील दूर सुनाई पड़ता था किसी काम का शोर
वहां बजते रहते थे विशाल इंजिनों के सिलेंडर
धुंआ और मजदूरों की लंबी सासें जिंदा दिन रात
मिट्टी को अलटती मशीनों की लंबी भुजाएं

रात को भी नहीं रुकती थी आवाज की बाढ़
काम लगातार होता था गांव को पता नहीं था
पुल नदी के लिए बनाया था या सूखने के लिए

वे आवाजें एक दिन पूरी तरह शांत हो गर्इं
मशीनें खराब पुरजे छोड़ कर न जाने कहां चली गर्इं
आसमान से देवता देखते थे यह सब
गांव सोचता था किसी देवता की करामात है यह
जैसे ही काम रुका नदी ने सूखना शुरु कर दिया

पुल एक सूखी नदी पर एक स्मारक था अब
जिस पर वक्त ट्रकों की तरह गुजरने लगा था

नदी बीमार गाय की तरह गांव में आती है
जब भी पुल के नीचे से गुजरती है
शाम की रोशनी में पुल से लिपट कर रोती है

3


तुम्हारा गांव और तुम

मेरे दोस्त मुझे नहीं चाहिए गांव
नहीं चाहिए इन गांवों की तरीफ

यहां कांटे कीचड़ पत्थर हैं
मेरे गांव को शहर बना दो

मैं बदल रहा हूं अपना गीत
जब तुम आते हो अपने गांव
दो दिन में ही लौट पड़े हो
क्यों न रहे तुम अपने गांव?

खेत नहीं खलिहान नहीं फिर कैसा ये गांव बचा
बैल नहीं, तालाब नहीं फिर ये कैसा ये गांव रहा

कोई नहीं लौटता गांवों में रहने
शहरों का अपराध लिए तुम भी


धीरे धीरे बच कर यादों की नाव चलाते
ओ कवि तुम हमको भी शहर बुला लो 

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परंपराएं


जब गांव सरककर हाईवे पर दुकान खोल लेता है
अपने गांव को याद करना कितना मुश्किल हो जाता है
बेचता है गन्ने का रस, सिगरेट, चाय और पेटिस
यह न जाने कहां से आ जाता है अपने आप दुकानों में

न जाने कैसे लोग आते हैं यहां
बगल में दादी चीखती सी है-
मांगते क्यों है वही जो वे खाना चाहते हैं
हम खाते हैं वे क्यों नहीं खाते वह

ये शहर वाले भी कभी गांव वाले थे
लाल मिर्च की सब्जी और तेल वाला गुरगा
आज क्यों कहते हैं मिर्च कम शकर कम
मीठा खाना तो नहीं रहा बुरा जन्म भर से
फिर शहर में ये क्या करने लगे ऐसा
शक्कर भी नहीं गुड़ भी नहीं मिरचा भी नहीं

अरे हमारी तो परंपरा रही है मीठा खाने की
मिरचा में दगा मुरगा और ज्वार की रोटी

ये शहर वाले मिरचा भी नहीं खाने देते
मीठा भी खाने से डरते डराते हैं भला
सारी ज्वार तुला कर ले गए खेतों से
बीज भी न बचने दे रहे यहां

समेटते से लगते हैं मेरे गांव की परंपराएं
लड़कियां भी गांव में शहर की तरह पंसद करते हैं

एक दादी भी कुछ दिन वकालत करेगी गांव की
फिर चली जाएगी जलने और   में एक दिन के लिए आऊंगा
इसके बाद गांव जल्दी जल्दी शहर होने की कोशिश करेगा

कोई भी कुछ नहीं करेगा
सारे गांव वाले कम शकर और कम मिर्च खाने लगेंगे







शुक्रवार, अक्टूबर 26, 2012

 Char Tippniya
शहीदों की चिताओं पर...

देश के लिए अपनी जिंदगी सौंपने वालों के दर्द को कोई नहीं भागीदार नहीं सकता। शहीद और उसके परिवार के प्रति संवेदनशील रहना समाज और प्रशासन की नैतिक जिम्मेदारी है।

मध्यप्रदेश में शहीदों के सम्मान समारोह में नरेंद्र सिंह के परिजन नहीं आए तो दिल्ली में देश की सेवा करते हुए शहीद अर्द्ध सैनिक बलों के जवानों को श्रद्धांजलि दी गई लेकिन उन्हें सैनिकों की तरह शहीद का दर्जा नहीं दिया। नरेंद्र कुमार के मामले में यह तो नहीं कहा जा सकता कि उनके परिजन मध्यप्रदेश प्रशासन से नाराज हैं या अन्य किसी कारण से नहीं आए। क्योंकि उनकी ओर से कोई बयान नहीं दिया है, लेकिन लगता यही है कि वे प्रदेश के पुलिस अधिकारियों के रवैये से व्यथित हैं। आईपीएस अधिकारी नरेन्द्र कुमार ने मार्च 2012 में मुरैना में अपने कर्तव्य का पालन करते हुए अपनी जान गवांई थी। उनकी मौत पर प्रदेश भर में पुलिस व्यवस्था को लेकर हंगाम भी हुआ था लेकिन छह आठ माह बाद सब उसी डर्रे पर आ गया लगता है।
हर साल सैंकड़ों जवान देश के लिए अपनी जान देते हैं। वे सुरक्षा और देश की व्यवस्था के लिए लड़ते हैं लेकिन इस जान को हमारी सरकारें, सत्ता और व्यवस्था रुटीन मौत समझ कर दूर हो जाती है। जबकि इन जवानों को पहले से पता होता है कि वे जिंदगी को दांव पर लगा रहे हैं। यह उनका जज्बा होता है लेकिन उनके मरने के बाद हमारी सरकारें उनको शहीद कहने के लिए कई बैठकें करना होती हैं। ऐसा लगता है, हम अपने देश के सैनिकों और पुसिल सिपाहियों और सीमा की निगरानी कर रहे जवानों को पूरा सम्मान नहीं दे पाते। क्या कारण है कि इस देश में सैनिक को रेलवे आरक्षण नहीं मिलता। वे जनरल बोगियों में जाते हैं। उनके भोजन और राशन में भ्रष्ट्राचार सामने आते हैं।
सेना और पुलिस के जबानों के पास कई समस्याएं हैं। वे अपनी समस्याओं के लिए किसी स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी के सामने गिड़गिड़ाने नहीं जाते। क्योंकि सेवानिवृत होने के बाद भी उसमें आत्म सम्मान होता है। सैनिक की आदत नहीं होती कि वह किसी नेता या अधिकारी से मिन्नतें करे। वह   बताए कि मेरी समस्याओं को देखिए। एक सच्चा सिपाही खुद ही अपनी समस्याएं नहीं बता सकता। लेकिन हमे अपने देश की सेवा करने वाले शहीदों के लिए पूरा सम्मान और उनकी समस्याओं के प्रति बेहद संवेदनशील नजरिया रखने की आवश्यकता है। देश में सितंबर 2011 अगस्त 2012 तक 546 जवानों ने सेवा में रहते हुए अपनी जान को कुर्बान किया है। लेकिन आधिकारिक रूप से पुलिस और अर्द्ध सैनिक बलों के लिए ऐसी कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं किया है। सरकारें भी इस दिशा में कोई ऐसे प्रयास नहीं करतीं जिससे पुलिस और सेना के जवानों के प्रति सामाजिक सम्मान में बढ़ोतरी हो और उनकी सुविधाओं का ख्याल रखा जाए। सामन्यत: देखने में आ रहा है कि सैनिकों, अर्द्धसैनिक बलों और पुलिस के सेवानिवृत जवानों या शहीदों के प्रति बहुत सम्मान नहीं रहा। देश पर मर मिटने की भावना को निरंतर आहत ही किया जा रहा है। सरकारें और संबंधित संस्थाएं  इस दिशा में कारगर उपाय करें। सुझाव दें ताकि देश की सीमाओं पर खड़े, आंतरिक व्यवस्था में संलग्न जवान को पूरा सम्मान मिल सके।



कचरे में कचरे की चिंता

भोपाल गैस त्रासदी का कचरा अब भी कायम है। यह जनता और प्रशासनिक कर्तव्यों के प्रति सरकारों की लापरवाही और गैर जिम्मेदारी है। हमें अपने नागरिकों के प्रति अधिक जिम्मेदार बनना होगा।


भोपाल गैस त्रासदी के जिम्मेदार कार्बाइड कारखाने से ज़हरीला कचरा 28 साल बाद भी नहीं हटाया जा सका। तमाम प्रयासों के बाद भी कचरा टस से मस नहीं हो रहा है। इस मामले में जितनी लापरवाही बरती गई है, उसका उदारहरण शायद ही दुनिया में कहीं देखने मिले। कार्बाइड परिसर में रखा 350 मीट्रिक टन कचरे को ठिकाने लगाने के लिए सैद्धांतिक रूप से शासन स्तर पर सहमती बनती है और फिर कोई न कोई अवरोध इस कचरे का रास्ता रोक लेता है। आज भी कचरा निष्पादन के स्थान को लेकर असहमति और अटकलों का दौर जारी है। अब जीओएम यानी गु्रप आॅफ मिनिस्टर्स ने तय किया है कि पहले कचरे को जला कर टेस्ट किया जाएगा। इतने सालों में ज़हरीले तत्व वातावरण में घुलकर हज़ारों ज़िंदगियों के रक्त में ज़हर घोल रहे हैं। बारिश के पानी के संपर्क में आकर ज़हरीले तत्व भूजल में मिल रहे हैं।
कचरे के लिए एडवायज़री और मॉनिटरिंग कमेटी का गठन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद किया गया। इन प्रयासों के तहत देश में उपलब्ध 27 स्थानों की कचरा निपटाने की व्यवस्थाओं का जायज़ा लेकर आवश्यक निर्णय लिए जाने की बात कही गई लेकिन आज भी कोई प्रगति नहीं है। एडवायज़री और मॉनिटरिंग कमेटी में पहले तय किया गया था कि ज़हरीला कचरा पीथमपुर में ठिकाने लगाया जाएगा। कचरा हटाने का काम छह महीने में पूरा कर लिया जाएगा लेकिन बाद में पीथमपुर पर भी सहमति नहीं बनी और तय किया गया कि देश के 27 स्थानों का जायज़ा लेने के बाद ही कोई फैसला किया जाएगा। इस मामले में अदालत की टिप्पणी भी उल्लेखनीय है। न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एसजे मुखोपाध्याय की खंडपीठ ने कहा, 28 साल बाद भी आप (हमारे नेता) नहीं जानते कि क्या करना है ऐसा इसलिए हैं क्योंकि जो लोग भोपाल में प्रभावित हुए और वहां रह रहे हैं, वे गरीब हैं। इस मामले से निपटने में ये आपकी नाकामी है।अदालत ने कहा कि इस समस्या से निपटने को लेकर गंभीरता का अभाव रहा है। यह समझ से परे है कि कारखाने की मालिक कंपनी को ही इस कचरे को सबसे पहले हटाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हो सका। क्यों? आज इस सवाल के हमारे पास हजारों उत्तर मिल जाएंगे लेकिन सवाल कचरे का अभी भी बना है। लेकिन लोककल्याणकारी सरकार होने का दम भरने वाली सरकारों ने इसे वहीं पड़ा रहने दिया। यह नागरिकों के इतिहास में दर्ज होने वाली प्रति ऐतिहासिक लापरवाही है।

सरकार की दूरदर्शिता
भूमि सुधार की आवश्यकता आजादी के तुरंत बाद से थी, लेकिन सरकारों के रवैये ने वर्षों तक लटकाए रखा। अब यह शुभ संकेत है कि सरकार इस पर विचार करने जा रही है।

दि  ल्ली की तरफ बढ़ रहे 50,000 किसानों और मजदूरों के सामने केंद्र सरकार ने समझदारी से भरा कदम उठा कर दूरदर्शिता का परिचय दिया है। इसीलिए आगरा में जन सत्याग्रहियों और केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश के बीच समझौता हो गया। इसके तहत सरकार पांच छह माह में कानून का ड्राफ्ट बनाएगी। सरकार ने कहा है कि जल्द भूमि सुधार के लिए टास्क फोर्स का गठन किया जाएगा। गौरतलब है कि जल, जंगल और जमीन के मद्दे पर करीब 50,000 आदिवासी और किसान दिल्ली के लिए पैदल ही निकले थे।  यह सत्याग्रह राष्ट्रीय भूमि सुधार परिषद का गठन की मांग पर जारी थी कि भारत के हर नागरिक को घर बनाने लायक जमीन दी जाए। आदिवासी क्षेत्रों के लिए कानून सख्ती से लागू हो। महिलाओं को भी किसान का दर्जा मिले। केंद्र सरकार की ओर से लैंडपूल बने, ताकि देशभर में खाली पड़ी जमीन के बारे में पता चल सके। इसके साथ ही उनकी मांग जमीन विवाद के निपटारे के लिए विशेष अदालतों के गठन की भी थी।
जबकि निर्धनता उन्मूलन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य गरीबी रेखा की बहस या बीपीएल-एपीएल की बहस आंकड़ेबाजी में भटक गई है। सस्ते अनाज का कार्ड बन जाने जैसे अस्थायी मुद्दे आगे आ रहे हैं जबकि गरीबी हटाने के टिकाऊ उपाय, जैसे भूमिहीनों को कृषि भूमि उपलब्ध करवाने के लिए जरूरी भूमि   सुधार जैसे मुद्दे पीछे रह गए हैं। अत: एक बार फिर भूमि-सुधारों को गरीबी उन्मूलन की बहस के केंद्र में लाना जरूरी हो गया है। पांच वर्ष पहले 2007 में इन्हीं संगठनों के जनादेश अभियान के अंतर्गत दिल्ली में 20,000 पदयात्री आए थे। सरकार से तब जो बातचीत हुई थी, उसके आधार पर भूमि-सुधार को आगे ले जाने का महत्वपूर्ण मसौदा तैयार किया था पर सरकार ने इस मसौदे को आगे ले जाने में कोई गंभीरता व मुस्तैदी नहीं दिखाई। सरकार की इस उपेक्षा को देखते हुए वर्ष 2010 में जन-सत्याग्रह आरंभ किया गया। इसे आगे बढ़ाते हुए राष्ट्रीय स्तर पर पदयात्रा की घोषणा की गई तो सरकार हरकत में आई व उसने अपनी ओर से भूमि-सुधार को आगे ले जाने का मसौदा प्रस्तुत किया।  यह सुनिश्चित होना चाहिए कि प्राकृतिक संसाधनों की लूट व इससे जुड़े भ्रष्टाचार पर रोक लगे। सबसे गरीब परिवारों को जहां जमीन चाहिए वहां इस जमीन पर सफल खेती के लिए छोटी सिंचाई योजनाओं, जल व मिट्टी संरक्षण के कार्यों की भी जरूरत है। साथ ही लघु वन उपज पर आदिवासी अधिकारों को मजबूत करना जरूरी है जिससे वन आधारित आजीविका भी फलती-फूलती रहे।
ग्रामीण क्षेत्रों में जिन नीतियों व कानूनों के कारण विस्थापन व आजीविका का विनाश बढ़ा है उन पर रोक लगनी चाहिए। जनता के अनुरूप ग्रामीण विकास को आर्थिक नियोजन के केंद्र में लाना जरूरी है। क्योंकि इससे उनकी सक्रिय भागीदारी बढ़ेगी। भूमि सुधार का स्वरूप क्या होगा यह सरकार द्वारा बनाए जाने वाले कानूनी ड्राफ्ट आने पर बता चलेगा। फिलहाल सरकार की दूरदर्शिता की तारीफ की जाना चाहिए।
...............

सेना की कमजोरी कौन
सेना किसी भी देश की सबसे ताकतबर इकाई होती है। इसे चौकस, संपन्न और मजबूत बनाए रखना जरूरी है। लेकिन जब यह भ्रष्टाचार की ओर जाती है तो दोहरे खतरे वाली तलवार भी बन जाती है।

र  क्षा मंत्रालय की अंदरूनी आॅडिट रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है कि सेना प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह, उनके पूर्ववर्ती जनरल वीके सिंह तथा अन्य शीर्ष जनरलों ने महज दो वर्षों में 100 करोड रुपए से अधिक के सार्वजनिक धन से अनियमित खरीदारी की है। रक्षा मंत्रालय के महालेखा परीक्षक (सीडीए) ने रक्षा मंत्री के निर्देशों पर 2009 से 2011 के बीच थलसेना के कमांडरों के 55 खरीद फैसलों की पड़ताल की। इस सब के बीच जो आदेश रक्षामंत्री महोदय ने दिए हैं, क्या यह प्रक्रिया नियमित रूप से नहीं की जानी चाहिए थी। आॅडिट करना एक नियमित प्रक्रिया है, ये खुलासे बहुत जल्दी या फिर कार्यकाल के दौरान ही होना चाहिए। सांप निकल जाता है इसके बाद लाठी पीटी जाती है। हम इस प्रकार की अनियमितताओं के लिए आज तक कोई प्रभावी नीति नहीं बना पाए हैं।
आॅडिट से यह भी खुलासा हुआ कि विदेशी उपकरण खरीदने में दिशा निर्देशों का बार-बार उल्लंघन किया। यही नहीं सेना के एक अंग ने जिन उपकरणों को खारिज किया उन्हें दूसरे अंग ने खरीद लिया। जनरलों ने अपने आपात खरीद के अधिकार के तहत चीन में बने संचार उपकरण तब खरीदे जब वे अपने-अपने क्षेत्रों के कमांडर थे। ये उपकरण सीधे निर्माता से खरीदने के बजाय एजेंट से लिए गए। इससे ये काफी महंगे पडे। बाद में पता चला कि चीन के उपकरणों में जासूसी करने वाला एक सॉफ्टवेयर भी फिट था। चीन समेत कई देशों की खुफिया एजेंसियां जासूसी के लिए ऐसे हथकंडे अपनाती हैं।आॅडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर ये उपकरण भारतीय फर्मों से लिए जाते तो सस्ते मिल जाते। मामला महज फिजूलखर्ची का नहीं बल्कि नियमों की अनदेखी और सुरक्षा से जुडेÞ मामलों को ताक पर रखने का भी है।
इसी प्रकार सेना में टाट्रा ट्रकों की खरीद का मामला सामने आने के बाद सरकार ने रक्षा सौदे में बिचौलियों की मौजूदगी पर पाबंदी लगा दी थी। नई व्यवस्था में सप्लाई का आॅर्डर पाने वाली हर कम्पनी को सरकार के साथ एक ईमानदारी कायम रखने का करार करना जरूरी हो गया। इसके बाद रक्षा सौदों में दलालों की भूमिका पर भी रोक लगी थी। लेकिन इससे कंसलटेंसी के नाम पर दलाल कम्पनियों की बाढ़ आ गई, जिनमें अवकाश प्राप्त फौजी अधिकारी, विदेशी विशेषज्ञ और अन्य लोग शामिल हैं, जो धड़ल्ले से इस काम को अंजाम दे रहे हैं। लेकिन यह सब बिना शक्तिशाली राजनीतिक संरक्षण अथवा शह के संभव है? किसी देश की सेना की यह स्थिति वास्तविक अर्थों में भयानक ही कही जा सकती है। देश की सेना में हो रहे भ्रष्टाचार के खुलासों पर सरकार को परदा डालने या मौन की नीति नहीं अपनानी चाहिए। परदा डालने से सेना के अंदर हो रहे इन कर्मकांडों पर रोक नहीं लगेगी। इस मामले में अधिक मजबूत और पारदर्शी व्यवस्थाएं बनाने और उन पर सख्ती से अमल की आवश्यकता होती है। सरकार को इस दिशा में नीयत से भी काम करना होगा वरना सेना में भ्रष्टाचार फैलेगा।

गुरुवार, अगस्त 09, 2012

बाढ़

  मध्यप्रदेश ही नहीं देश के अन्य राज्यों में भी बाढ़ से जनजीवन प्रभावित हो रहा है। हमें यह ख्याल रख कर दूरगामी बाढ़ प्रबंधन करना होगा कि कभी भी पानी अधिक बरस सकता है।

देश में प्रारंभिक मानसून की बेरुखी के बाद देश के कई हिस्सों में लगातार हो रही बारिश की वजह से बाढ़ के हालात बन गए हैं। पूर्वी उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में जमकर बारिश हो रही है। अकेले मध्यप्रदेश में ८त्न घंटे से हो रही भारी वर्षा के कारण ८ हजार परिवार (लगभग ६ञ् हजार लोग) आए हैं।  प्रकृति अपना काम करती है। पहले भी ऐसी बाढ़ें आती रही हैं। लेकिन मानवीय प्रबंधन की सीमाओं के कारण हालात दयनीय हो जाते हैं। पानी प्रकृति का प्रवाह है वह अपनी गति और नीति से बहता है। आज मध्यप्रदेश ही नहीं पूरा देश जल असंतुलन का शिकार है। ऐसी स्थितियों में बाढ़ प्रबंधन की भूमिका महत्वपूण हो जाती है।
नर्मदा व तवा नदी के खतरे के ऊपर बहने से आसपास के करीब ५ञ्ञ् गांव बाढ़ से घिरे हैं।  यहां के हालातों को सम्हालने के लिए सेना की मदद लेना पड़ी है। मध्यप्रदेश में भारी बारिश के चलते कुछ जिलों में दो दिनों की छुट्टी का एलान कर दिया गया है. कई दिनों की बारिश से कुछ फायदे तो हुए हैं लेकिन नुकसान भी कम नहीं हुआ है। लेकिन दूसरी तरफ देश के कुछ हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति है। राजस्थान में ७७ में से ६त्न जिलों में बारिश नहीं होने के कारण लोगों को पानी की चिंता सता रही है। केवल छह जिलों में सिर्फ बुवाई लायक ही बारिश हुई है।  राज्य सरकार ने अभी पाच जिलों को ही सूखाग्रस्त घोषित किया है। वहां ६त्न जिलों में अस्सी प्रतिशत तक कम बारिश हुई है।
दूसरी तरफ कुछ राज्यों में बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। उत्तर प्रदेश में उफनाई नदियों ने बाढ़ नियंत्रण उपायों की पोल खोल दी है। घाघरा, रामगंगा, वरुणा, शारदा, सरयू, राप्ती, जैसी नदियों का जलस्तर बढ़ा हुआ है। गंगा व यमुना का जलस्तर भी खतरे के निशान की ओर बढ़ रहा है। प्रदेश में बाढ़ प्रभावित ७त्र जिलों में  स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर है। बहराइच में उत्तरी तटबंध पर पानी का दबाव बढ़ने से कई जगह से रिसाव की सूचना है। बाढ़ पीड़ितों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने और भोजन आदि की व्यवस्था भी संतोषजनक नहीं है। ये शिकायतें प्रतिवर्ष हो सकती हैं लेकिन बाढ़ के लिए हम कितने तैयार होते हैं यह तभी पता चलता है जब बाढ़ आती है।
अगस्त ६ञ्ञ्८ में जो बाढ़ आई थी उस समय प्रधानमंत्री ने उस मौके पर बाढ़ प्रबंधन के लिए एक टास्क फोर्स बनाई थी। उसने दिसंबर ६ञ्ञ्९ में रिपोर्ट दी थी। उसमें बाढ़ प्रबंधन के लिए स्थाई और दूरगागी समाधान दिए गए थे। जहां तक बाढ़ के स्थाई प्रबंध का मसला है तो यह राष्ट्रीय मुद्दा है। मानसून से पहले देश में जगह-जगह बाढ़ से बचाव के प्रबंध अब एक अनिवार्यता हो चुकी है। जहां बांध बनाए जा सकते हैं वहां बांध बनाए जाना चाहिए।  जहां जरूरी हो वहां ड्रेनेज का इंतजाम भी होना चाहिए।  आने वाले वक्त में हमें देश के विकास और जीवन की सुविधाओं के विस्तारको भी ध्यान में रखना होगा। हमें यह ख्याल रखना होगा कि अतिवृष्टि कभी भी हो सकती है इसलिए  हमें बाढ़ प्रबंधन नए प्रयास करते रहना होंगे।

सोमवार, मई 28, 2012

केंद्र,भ्रष्टाचार और उसके पंद्रह मंत्री

 

टीम अन्ना के आरोपों से सरकार ही हैरान नहीं है, भविष्य के नेता भी चिंतित नजर आते हैं। इसका कारण है कि जनता अब जिम्मेदारों से कुछ सवाल करने लगी है।

टी  म अन्ना का भ्रष्टाचार पर हल्ला बोलो अभियान अपना दायरा नहीं बढ़ा रहा है। शनिवार को उसने प्रेस कांफ्रेंस में यह इरादा जाहिर कर दिया। टीम अन्ना ने सबूतों के साथ टीम अन्ना ने प्रधानमंत्री समेत 15 केंद्रीय मंत्रियों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए जांच की मांग की है। इसी के साथ टीम अन्ना ने जांच नहीं होने पर 25 जुलाई से आंदोलन का ऐलान भी किया है। यह वैसी ही बात है कि भ्रष्टाचार की वेदी पर टीम अन्ना यूपीए सरकार से पंद्रह मंत्रियों की कुर्बानी मांग रही है। अब कौन सरकार अपने ही मंत्रीमंडल पर सामूहिक अभियोग चला सकती है? टीम अन्ना की मांगें जायज या नाजायज हैं इससे अधिक महत्वपूर्ण ये है कि उन्होंने एक सरकार के सामने धर्म संकट खड़ा कर दिया। यह ऐसा धर्म संकट है कि इसमें जन सामान्य भी उलझ गया है। कोई एक या दो मंत्री की बात नहीं, प्रधानमंत्री समेत यहां पूरे पंद्रह मंत्री हैं। टीम जो आरोप लगा रही है वे कमीशन, लाभ कमाने या लाभ पहुंचाने के हैं।  येआरोप अलग अलग समय और उनके कार्यकालों के हैं।
टीम के आरोपों पर तिलमिलाए विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण के खिलाफ मानहानि का केस दायर करने की बात कही है। कृष्णा की अरविंद केजरीवाल को लिखी चिट्ठी में कहा कि उन पर लगाए गए आरोप गलत और बेबुनियाद हैं और जो भी तथ्य उनके बारे में बताए गए हैं वो गलत हैं। यह अलग बात है कि ये आरोप कितने सही और कितने गलत निकलेंगे लेकिन जब टीम अन्ना जांच के लिए सरकार को छह जजों के नाम भी सुझाव देती है और कहती है कि जांच का काम इन छह में से किन्हीं तीन जजों को सौंपा जा सकता है। सरकार उनके द्वारा बताए जजों से जांच करवाए।  ऐसे में तब लगता है कि आखिर टीम अन्ना आंदोलन कर रही है या वैचारिक आंदोलन के नाम पर माइक्रो तानाशाही को लागू कर रही है?
 इस समय अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र भेजा है, जिसमें 15 मंत्रियों के खिलाफ आरोपों की  जानकारियां हैं।  इस पत्र को  ‘चार्जशीट’ नाम दिया गया है।  वास्तव में देखा जाए तो  यह सूक्ष्म स्तर पर संबैधानिक व्यवस्थाओं का मजाक है। टीम अन्ना छह जजों को नामित क्यों कर रही है? देश और सरकार द्वारा नामित जजों पर यकीन नहीं? या केवल छह जज ही भारत में हैं जो इन मंत्रियों की जांच कर सकते हैं? यह अविश्वास का बीजारोपण है।  इससे देश में एक दूसरे तरह की अराजकता का माहौल पैदा हो सकता है। टीम अन्ना जनजागरण का काम कर रही है तो ऐसा भी लगने लगता है कि वह राजनीतिक वैचारिक असंतुलन का शिकार भी है।