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बुधवार, जुलाई 18, 2012

 
काका का चले जाना


राजेश खन्ना को असली कामयाबी 1969 में आराधना से मिली। इसके बाद लगातार 14 सुपरहिट फिल्में देकर उन्होंने हिन्दी फिल्मों के पहले सुपरस्टार का तमगा अपने नाम किया।

ए  क दिन पहले ही काका अस्पताल से घर आए थे। दो दिन घर में बिताए और फिर अमृत यात्रा पर दूर चले गए। यह सफर ऐसा है जो अपनी तरह से ही रास्ता तय करता है। दुनिया के हर सफर से ऊपर और अलहदा। राजेश खन्ना इस धरती पर 29 दिसम्बर 1942 को आए थे। अमृतसर में जन्मे राजेश को बचपन में जतिन खन्ना के नाम से जाना गया था। उनकी जिंदगी में फिल्मी सपने जल्दी ही समाहित हो गए थे। राजेश खन्ना एक टेलेंट हंट प्रतियोगिता के विजेता बन कर फिल्मों में आए थे और फिर हिंदी सिनेमा के आकाश पर चमकते ऐसे स्टार बन गए जिसकी चमक सदियों तक कायम रहने वाली है। यह टेलेंट हंट प्रतियोगिता यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स और फिल्मफेयर ने 1965 में कराई थी, जिसमें लगभग दस हजार लोगों ने हिस्सा लिया और आखिर में इसके विजेता बने राजेश खन्ना।
जिंदगी को जिस तरह उन्होंने अपनी फिल्मों में गाया था वैसी जिंदगी को जिया भी। उनकी जिंदगी एक इंसान की जिंदगी थी जहां स्टारडम का जलवा था तो गम भी थे, शराब और टूट जाने की हद तक बेदारी भी थी। राजेश खन्ना ने 1966 में पहली बार 24 साल की उम्र में आखिरी खत नामक फिल्म में काम किया था। इसके बाद राज, बहारों के सपने, औरत के रूप जैसी कई फिल्में उन्होंने कीं। ये फिल्में उन्हें बंबई की फिल्मी दुनिया के पाठ पढ़ा रही थीं और वे लगातार सीख रहे थे। लेकिन उन्हें असली कामयाबी 1969 में आराधना से मिली। इसके बाद14 सुपरहिट फिल्में देकर उन्होंने हिन्दी फिल्मों के पहले सुपरस्टार का तमगा अपने नाम किया।
फिल्मों की इस रुपहली दुनिया ने जितना सुख और आनंद राजेश खन्ना को सुपरस्टार के रूप में दिया तो जिंदगी के उत्तरार्ध में उतना दुख भी उन्होंने भोगा। अकेलापन और शराब ही उनके जीवन पथ के साथी बन चुके थे। अक्षय ने उनके जीवन को संजोने की कोशिश की थी जिसमें वे एक दामाद की तरह सफल भी रहे थे। राजेश ने फिल्मों में जो संवाद अपनाए थे वे उनकी जिंदगी में भी रहे। ...मौत तो एक कविता है और जिंदगी लंबी नहीं, बड़ी होनी चाहिए...जैसे संवादों के जरिए दर्शकों के दिलो-दिमाग पर छा जाने वाले राजेश खन्ना ने सचमुच बड़ी जिंदगी जी। जिस दौर में उनकी लोकप्रियता चरम पर थी उस समय कहा जाता था-ऊपर आका, नीचे काका। लड़कियों के बीच तो उनकी दीवानगी का आलम यह था कि कई लड़कियों ने उनकी तस्वीर से शादी कर ली थी। ये रुपहले परदे से पैदा स्टारडम का कमाल था। राजेश खन्ना को लोग प्यार से काका कह कर पुकारते थे।
1980 के बाद राजेश खन्ना का दौर खत्म होने लगा। बाद में वह  राजनीति में आए और 1991 में वह नई दिल्ली से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा के लिए चुने गए। लेकिन वक्त की रील नहीं रुकती। 18 जुलाई 2012 को जीवन की रील का अंतिम शिरा काका से ही नहीं हम सबके हाथों से दूर जा चुका है। काका की स्मृतियां सदियों के माथे पर सदैव लिखी रहेंगी।


क्रिकेट की बिसात पर
भारत और पाकिस्तान दुनिया के लिए दो देश हैं लेकिन उनके राजनीतिक रिश्ते घृणा और आतंक के साये में पलते रहे हैं।आज तक का इतिहास है  कि वे सदैव इसी तरह अपने रिश्तो ंको बनाए रखने के आदी हो चुके हैं।

किसी भी देश के साथ रिश्तों की सहजता उसके आपसी हित, व्यापार, राजनीतिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों पर बहुत कुछ निर्भर होती है। भारत पाकिस्तान के रिश्ते एक देश के दो टुकड़ों की त्रासदी के साये में पलते हैं। दोनों देशों घृणा के बीज बोने वाले लोग हैं तो खेल और सांस्कृतिक आधारों पर रिश्तों को सहज बनाने वाले लोग भी हैं। दोनों देशों के बीच राजनीतिक प्रभाव और मतों की खींचतान से भी रिश्ते प्रभावित होते रहे हैं। सेना और आतंक के सहारे अपने हित साधने वाले तत्व भी भारत पाक के रिश्तों को सहज नहीं होने देते।  सहज और सरल पक्ष खेल और सांस्कृति का बचता है, इसे भी राजनीति के भंवर में डाल कर जहरीला बनाया जाता रहा है।
पाकिस्तान भारत के बीच बचे खुचे रिश्तों के सूत्र 26 नवंबर 2008 के मुंबई आतंकी हमले के बाद खत्म हो गए थे, अब इस रिश्ते को फिर से कायम करने शुरुआत पर कुछ लोग खुश दिख रहे हैं, तो कुछ लोग संभलकर चलने की हिदायत दे रहे हैं। चार दिन के आंतकी हमले के बाद बनी खाई में सभी रिश्तेऔंधे मुंह पड़े हुए थे। अब इस सिलसिले को फिर से शुरू करने की बात उठने पर विरोध और समर्थन के स्वर मुखर हुए हैं। भारत-पाक के विदेश सचिवों ने बातचीत में कहा था कि दोनों देशों के बीच मीडिया और स्पोर्ट्स को बढ़ावा देना चाहिए। इस मामले में मुंबई प्रेस क्लब के अध्यक्ष गुरबीर सिंह का मानना है कि मुंबई और कराची प्रेस क्लबों की पहल पर दोनों देशों के मीडिया कर्मियों एक-दूसरे के देशों में आवागमन शुरू होने से काफी भ्रम दूर हुए हैं। तो दूसरी तरफ  सुनील गावस्कर ने क्रिकेट सीरीज  का विरोध करते हुए कहा है कि पाकिस्तान ने मुंबई हमले की जांच में कोई प्रगति नहीं की है। पाकिस्तान जांच में सहयोग नहीं कर रहा है तो क्रिकेट संबंध बहाल करने की जरूरत ही क्या है?
इस मुद्दे पर शिवसेना ने आसमान सिर पर उठा लिया है। कांग्रेस में भी विभ्रम की स्थिति पैदा हो चुकी है। कांग्रेस में इस पहल का सीधा   स्वागत नहीं हुआ है। कुछ लोगों ने क्रिकेट पर प्रतिक्रिया में कहा है कि आतंकवादियों को और बुला लेते। ऐसे कथनों को अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक नजरिये से नहीं पार्टीगत फैसले से प्रेरित ही अधिक कहा जाएगा। इस मामले में देश की पार्टियों में गहरे विरोधाभास देखने मिल रहे हैं। शिवसेना का विरोध करने वाली महाराष्ट्र समाजवादी पार्टी की ओर से अबू आसिम आजमी भी इस पहल का विरोध करते हुए सवाल करते हैं कि मुंबई पर हमले के दोषी किसी देश के साथ हमें क्रिकेट क्यों खेलना चाहिए? इस तरह का सवाल वाजिब है? 
लेकिन हमें अपने हितों के साथ संघर्ष भी जारी रखने होंगे। हमें आतंकवाद के मुद्दे पर सकारात्मक तरीके से निबटना चाहिए। दोनों मुद्दों को देर तक बनाए रखने से देश के हितों को साधने की प्रक्रिया को ठेस भी पहुंच सकती है। हम अमेरिका का उदाहरण देख सकते हैं। वह आतंक और अपने हितों पर पाकिस्तान से अपना काम ले रहा है।



अमेरिका की ठगी

अमेरिका के हित ही उसका सर्वोपरि व्यापार है। अपने हर बयान में वह अपने हितों को प्राथमिकता देता है। उसके भारत से कैसे भी संबंध हों , उसका नजरिया शायद ही बदलने वाला हो। ओबामा का बयान इसकी नजीर है।

यह अच्छी बात है कि आर्थिक सुधारों पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के उपदेश भारत सरकार को नहीं भाए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति को भारत की तीखी प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ रहा है। ओबामा के बयान पर सरकार के ओर से कॉरपोरेट मामलों के मंत्री वीरप्पा मोइली ने भी एतराज दर्ज कराया है। उन्होंने वोडाफोन का नाम लेते हुए कहा कि एक खास अंतरराष्ट्रीय लॉबी भारत के बारे में गलत बातों को हवा देने में लगी है। वहीं, इस ममाले में बीजेपी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने कहा कि अगर ओबामा का इशारा रीटेल में एफडीआई पर है, तो जरूरी नहीं कि हम भी अमेरिकियों की तरह सोचें। अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत के बारे में आर्थिक माहौल खराब होने वाली जो बातें कहीं हैं, उनसे कोई भी भारतीय संगठन सहमत नहीं है। ओबामा ने भारत में निवेश का माहौल पहले से खराब होने, नियमों की सख्ती बनी रहने, रिटेल और कई सेक्टरों में बहुत-सी पाबंदियों का जिक्र पीटीआई को दिए साक्षात्कार में किया है। ओबामा ने भारत के बारे में चिंता भी जता दी है। लेकिन यह चिंता कम अमेरिका को अपनी व्यापारिक कंपनियों की हालत सुधारने के प्रयास अधिक लगते हैं। ओबामा अपनी चिंता में कहते हैं कि भारत को अपने लिए रास्ता खुद तय करना है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि भारत तो अपना रास्ता तय कर रहा है लेकिन इससे अमेरिकी राष्ट्रपति को क्या तकलीफ हो रही है। इस साक्षात्कार में व्यक्त कथित चिंताओं का भारत द्वारा प्रतिरोध किया गया है। भारतीय नीति नियंताओं का मानना है कि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव होने वाला है इसलिए वहां चुनाव से पहले एफडीआई, रीटेल और कई दूसरे सेक्टर की लॉबी का ओबामा पर भारी दबाव है।  इन्हीं प्रयासों के तहत विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन कोलकाता में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात करने आ धमकती हैं। हिलेरी और ममता की बातचीत बेनतीजा रही। उसके बाद  खुद अमेरिकी राष्ट्रपति मैदान में अपने बयानों के हथियार लेकर आते हैं।
ओबामा के बयान पर सीआईआई, एसोचैम और अन्य व्यापारिक संगठनों की राय भी आई है। इन संगठनों ने कहा है कि देश  में इन्वेस्टमेंट का माहौल ठीक है। ग्लोबल मंदी के नए दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था कई विकसित देशों के मुकाबले 6 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है।वामपंथी पार्टियों और समाजवादी पार्टी ने भी कहा है कि अमेरिका के कहने से भारतीय अर्थव्यवस्था को खोला नहीं जा सकता है।
भारत के अपने हित हैं और उसकी जनता ही उसकी प्राथमिकता है। यह शुक्र करने वाली बात है कि उदारीकरण के नाम पर सब सौपने की अपेक्षा अभी पार्टियों में लाज बची हुई है। भारत की जनता को अमेरिकी व्यापारियों के लिए चरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। भारत को वैश्विक अर्थ व्यवस्था में अपनी तरह की आर्थिक दुनिया का निर्माण करने की आवश्यकता है। यही भारतीय अर्थ व्यवस्था की प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए।

सोमवार, जुलाई 09, 2012

पाक सरकार की पलटी

 


पाकिस्तान और भारत दो ऐसे देश हैं जिनके पास आपसी समझ की
कमी है। पाकिस्तान के पास ये कुछ ज्यादा ही है। लगभग सभी मामलों में दोनों देशों के शासकों का रवैया जनता से मजाक का रहा है।


पा किस्तान की जेल में बंद भारतीय कैदी सरबजीत सिंह को रिहा किए जाने की खबरों के कुछ ही मिनिट बाद भारत में सरबजीत के परिजन जश्न मनाने लगे। विदेश मंत्री एस एम कृष्णा ने भी पाकिस्तान को बधाई प्रेषित कर दी। खास बात ये है कि विदेश मंत्री ने यह बधाई बिना आधिकारिक  सूचना या आदेश प्राप्त किए दी थी। होना ये चाहिए था कि जब तक सरबजीत भारतीय सीमा में न आ जाता तब तक जश्न से दूर ही रहना था। मीडिया भी उतावला होकर मौखिक सूचना पर सरबजीत की रिहाई का महिमामंडन करने लगा। सरबजीत रिहा होता तो यह खुशी का अवसर था लेकिन यह भारतीयों की भावुकतापूर्ण नासमझी थी जो देर रात गए दुख में बदल गई। पाकिस्तान सरकार का आदेश भारत सरकार या विदेश मंत्रालय तक नहीं आता तब तक इसे रिहाई नहीं कहा जाना था। इससे साबित होता है कि हम आज भी पड़ोसी को नहीं समझ सके हैं और उससे कोई सबक नहीं सीख रहे हैं। यह खबर हजार बार सच होती तब भी देश को, मीडिया को आधिकारिक आदेश का इंतजार तो करना ही चाहिए था।
 इस घटनाक्रम के कुछ ही घंटे बाद पाकिस्तान ने सफाई दी कि उसने सरबजीत सिंह नहीं बल्कि एक अन्य भारतीय कैदी सुरजीत सिंह को रिहा करने के लिए कदम उठाए हैं। ‘जियो न्यूज’ पर आकर राष्ट्रपति के प्रवक्ता फरहतुल्लाह बाबर ने कहा कि मुझे लगता है कि इस सम्बंध में कुछ गलतफहमी हुई है। यह क्षमादान का मामला नहीं है और सरबजीत का भी नहीं है। खबर तत्काल भारतीय मीडिया पर भी आ गई। कहा जाने लगा कि पाकिस्तान पलट गया। बेशक पाकिस्तान पलटा होगा लेकिन हमें तो अपना विवेक नहीं खोना था। हम अच्छी तरह जानते हैं कि पाकिस्तान को मुल्ला, फौज और अमेरिका संचालित करते हैं। सरबजीत की रिहाई सेना को या मुल्ला लॉबी को पसंद नहीं आने की बात भी उठी थी। अतंत: छह घंटे बाद पाकिस्तान को पलटना पड़ा।
दूसरा पक्ष ये है कि अगर पाकिस्तान नहीं पलटा है तो यह भी आश्चर्य है कि विदेशी मामले में पाकिस्तान सरकार से इतनी लापरवाही कैसे हुई? सरकार को सुरजीत और सरबजीत के नाम को लेकर संदेह कैसे हुआ? दोनों की सजा अलग-अलग थी, फिर नाम को लेकर भ्रम कैसे हो गया? 6 घंटे के अंदर ऐसा क्या हुआ कि सरबजीत की जगह सुरजीत का नाम आ गया? अनुमान है कि सरकार दबाव में है लेकिन सरकार पर दबाव किसका है? पाकिस्तान में एक बड़ा तबका ऐसा है जो सरबजीत सिंह की रिहाई की खबर के बाद विरोध में सक्रिय हो गया था। पाकिस्तान की विपक्षी पार्टी मुस्लिम लीग नवाजÞ भी रिहाई के फैसले का विरोध कर रही थी। आखिर में वही हुआ जो नहीं होना था। सरकार को पलटना पड़ा। पाकिस्तान सरकार के दो बयानों से दोनों देशों में असमंजस की स्थिति बनी। इससे यह भी साबित होता है कि सरकारें दबाव समूहों के सामने कितनी लाचार हो सकती हैं।


एकरूप होगी न्यायिक सेवा


भारतीय न्याय व्यवस्था में यूपीएससी से जजों के चयन से प्रोफेशनजिज्म का विकास होगा और इससे कानूनी प्रक्रिया को अधिक तर्कसंगत और आम आदमी के प्रति जिम्मेदार बनाया जा सकेगा।



भो पाल में आयोजित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के कार्यक्रम में कानून और न्याय के विभिन्न पक्षों पर नई अवधारणाएं प्रस्तुत की गर्इं। इसमें जो महत्वपूर्ण विचार सामने आया वह था जजों को भी यूपीएससी के माध्यम से चयनित किया जाएगा। संघ लोक सेवा आयोग के चेयरमैन प्रो. डीपी अग्रवाल ने इस विचार से संबंधित अवधारणा के बारे में बताया है। इससे न्याय व्यवस्था में एकरूपता आएगी और इसमें फैले भ्रष्टाचार से भी मुक्ति मिलेगी। फिलहाल यह विचार अभी प्रक्रिया का हिस्सा है लेकिन आने वाले समय में इस विचार को मूर्त रूप दिया जाना है। नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (एनएलआईयू) में आयोजित ओरिएंटेशन प्रोग्राम में इस नई अवधारणा और अन्य कानूनी व्यवस्थाओं पर विचार विमर्श किया गया था। इस अवधारणा से संविधान के अनुरुप न्याय को सब तक पहुंचाने के विचार को बल मिलेगा। वैसे भी भारत की न्याय प्रणाली सबसे पुरानी प्रणालियों में से एक है। संविधान की प्रस्तावना भारत को ‘संप्रभुता संपन्न प्रजातांत्रिक गणराज्य’ के रूप में पारिभाषित करती है, इसमें केंद्र और राज्यों में संसदीय स्वरूप वाली संघीय शासन प्रणाली, स्वतंत्र न्यायपालिका, संरक्षित मौलिक अधिकार और राज्य के नीति निर्देशक तत्व, जिन्हें लागू करने के लिए सरकारें कानूनन बाध्य नहीं, लेकिन प्रक्रिया में शामिल हैं और यह सब राष्ट्र के प्रशासन के आधारभूत तत्व हैं। यही वह पक्ष है जिससे सदैव कानून और न्याय की अवधारणा को बल मिलता रहेगा?
किसी भी न्याय प्रक्रिया को सार्वजनिक हितों के लिए उपयुक्त बनाने के लिए आवश्यक है कि उसकी एकरुपता और व्यापकता पर विचार किया जाता रहे। कानून के क्षेत्र में विद्यार्थियों को खुद पर विश्वास तथा विषय की गहरी समझ रखना जरूरी है।  युवा वकीलों और जजों के रूप में आम लोगों को उनके कानूनी लाभ दिलाने और उनके अधिकार से अवगत कराने में सफल होंगे।
यह सच है कि न्याय की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब वह देश के अंतिम नागरिक को भी   उतनी ही सहजता से उपलब्ध हो जितनी कि संसाधनों से संपन्न व्यक्ति के लिए हो सकता है। इस मार्फत अगर आज की विधायी प्रक्रिया की बात करें तो हमें बहुत ही निराशाजनक उत्तर मिलेगा? चाहे वह कानूनी व्याख्यायओं का मामला हो या फिर वर्तमान में जारी न्याय व्यवस्था की प्रतीक अदालतें। इसमें सबसे अधिक दिक्कत है प्रोफेशनल तरीके और नजरिए की कमी की। आज की पेचीदा कानूनी प्रक्रिया में मानवीय पक्ष को शामिल किया जाना भी जरूरी है। मशीनी और तर्क आधारित न्याय व्यवस्था में मनुष्य को न्याय का वास्तविक लाभ मिलना संभव नहीं हो सकता। कानून की जिम्मेदारी संभालने वाले और कानून के द्वारा न्याय प्रस्तुत करने वाले युवा ही हैं जो परिवर्तन को शीघ्रता से अपना सकते हैं। न्यायाधीशों के एकरूप चयन से न्यायिक सजगता आएगी। युवा जजों और वकीलों में कानून के गहरे अध्ययन के प्रवृत्ति को बल भी मिलेगा।



बोसोन बदलेगा तकनीक

बोसोन के जो गुणधर्म हैं अगर वे वैज्ञानिकों ने नियंत्रत करना सीख
लिया तो धरती पर मानव सभ्यता तकनीक के ऐसे दौर में चली जाएगी जिसकी हम आजतक कल्पना भी नहीं कर सके हैं।



हि ग्स बोसान मिल ही गया जिनेवा में भौतिक वैज्ञानिकों ने बुधवार 4 जुलाई 2012 को एक प्रेस कांफ्रेंस में दावा किया कि उन्हें प्रयोग के दौरान ये कण मिला है, जिसके गुणधर्म हिग्स बोसोन से मिलते हैं। अब असली सवाल है कि बोसोन को उसके अस्थिर गुणधर्म के कारण नियंत्रित करना मुश्किल है। बोसोन ऐसा आधारभूत कण है जो अपनी प्रकृति और रूप पल-पल बदलता है। अब वैज्ञानिक इस नए कण से संबंधित आंकड़ों के विश्लेषण में जुटे हैं। हालांकि इसके कई गुण हिग्स बोसोन सिद्धांत से मेल नहीं खाते हैं। फिर भी इसे ब्रह्मांड के जन्म के  रहस्य खोलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण  कदम  माना जा रहा है।
बोसोन को 6000 वैज्ञानिकों की टीम ने 10 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च करके जिस कण की खोज की है, वह संसार के बनने और चलने का आधार है। इस एक कण ने ब्रह्मांड के हजारों कण और पदार्थों को बांध रखा है, मगर आज तक ईश्वर की तरह किसी ने इसे देखा नहीं है। इसी कारण इस कण को गॉड पार्टिकल कहा जा रहा है।  इस कण के दिखते ही सृष्टि के बनने और चलने की कहानी की ओर वैज्ञानिक कदम बढ़ा सकेंगे और  जीवन और ब्रह्मांड की कई अनसुलझी गुत्थियां भी सुलझ जाएंगी।
गॉड पार्टिकल सामने आने तक वैज्ञानिक उपलब्धियों के हिसाब से 2011 बहुत महत्वपूर्ण साबित हुआ। पार्टिकल फिजिक्स, एस्ट्रोनॉमी और जीव-विज्ञान के क्षेत्र में नई खोजों ने हमें सबसे ज्यादा चौंकाया। वैज्ञानिकों द्वारा एक अन्य प्रयोग में यह भी साबित करने की कोशिश की कि न्यूट्रिनो कणों की रफ्तार प्रकाश से भी ज्यादा है। यह  खोज अल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत के एकदम विपरीत है, जो यह कहता है कि प्रकाश से ज्यादा तेज कुछ नहीं। अगर यह खोज पूरी तरह से स्थापित हो जाती है, तो हमें फिजिक्स की किताबें फिर से लिखनी पड़ेंगी।
कण का ‘बोसोन’ नाम भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्रनाथ बोस के नाम से ही लिया गया है। यह भारत के लिए गौरव की बात है। भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्रनाथ बोस का जन्म 1 जनवरी, 1894 को कलकत्ता में हुआ था। उन्होंने आंइस्टीन के साथ मिलकर एक फार्मूला पेश किया था, जिससे खास तरह के कणों का गुण पता चलता है। ऐसे कण बोसोन कहलाते हैं। ब्रह्मांड की हर वस्तु तारा, ग्रह, उपग्रह व जीव जगत पदार्थ या मैटर से बना है। मैटर का निर्माण अणु-परमाणु से हुआ है। जबकि मास या द्रव्यमान वह भौतिक गुण है, जिनसे इन कणों को ठोस रूप मिलता है। अगर द्रव्यमान नहीं है तो कण रोशनी की रफ्तार से भगेगा, दूसरे कणों के साथ मिलकर संघनित होने की संभावना भी नहीं बनती। यही द्रव्यमान जब ग्रेविटी से गुजरता है तो भार कहा जाता है। लेकिन भार द्रव्यमान नहीं होता, क्योंकि ग्रेविटी कम या ज्यादा होने पर भार बदल जाता है। वहीं द्रव्यमान एक जैसा रहता है। बोसोन इसी गुण का प्रतिनिधित्व करता है। यही गुण मानव सभ्यता के वैज्ञानिक विकास के नए आयाम प्रस्तुत करेगा।
by
Ravindra Swapnil Prajapati