बुधवार, जून 23, 2010

डर लगता है ये पेड़ कल रहे न रहे

 

उर्मिला शिरीष से बातचीत पर आधारित


मेरी चिंता डर में बदल गई है। मैं अक्सर आते जाते किसी पेड़ को देखती हूं और सोचती हूं कि कहीं यह कल न दिखा तो। कहीं यह कट गया तो... कब यह दिखना बंद हो जाएगा पता नहीं...।  लेकिन मुझे आशा है कि जल्दी ही हम अपने परिवेश और पर्यावरण के बीच पौधों
को इस डर से मुक्त कर लेंगे।


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पर्यावरण का मतलब हरियाली नहीं है जो कि कभी होता था। अब पर्यावरण का मतलब है कि आसपास उजाड़ जंगल, सूखी, गंदी नदियां। प्रदूषित वायु, गंदा पानी ये सब पर्यावरण के अर्थ की तरह हो गए हैं। आज पर्यावरण को कानून की आवश्यकता है। पर्यावरण का मतलब है कि पेड़ काटे जाना बंद होना चाहिए। पर्यावरण की रक्षा के लिए विकास के नाम पर प्रकृति की बरबादी कानूनन बंद हो जाना चाहिए। सबसे अधिक विकास के नाम पर पेड़ों की कटाई हो रही है। कई तरीके से लोग प्रकृति को बरबाद करने पर तुले हुए हैं। हम सब इसके लिए जिम्मेदार हैं। हमें प्रकृति के साथ रहना ही नहीं आया। हम जो कुछ कर रहे हैं वह प्रकृति पर अत्याचार की तरह है।
 चारों तरफ विकास के नाम पर पेड़ काटे जा रहे हैं। चाहे सड़क चौड़ी करना हो या फिर कोई नई कालोनी बसाना हो। पेड़ और प्रकृति का परिवेश ही उजड़ता है। यही कारण है कि वन्य जीवों के प्राकृतिक रहवास नष्ट हो रहे हैं। उन्हें नदियों और जंगलों से उजाड़ कर हम अपनी कालोनियां, कारखाने, उद्योग लगाए जा रहे हैं। अब वे इंसानी बस्तियों की ओर पानी और भोजन की तलाश में मरने चले आते हैं। गांव और शहरों के लोग समान रूप से निरीह और खतरों से अनजान जानवरों को निर्दयता से मारने दौड़ते हैं या मार डालते हैं। बस्ती में आना जानवर की मजबूरी है, जिसे मनुष्य ने ही पैदा किया है। क्या कारण है कि जानवरों के लिए बहने वाली नदियां सूख गर्इं। उनके रहने के स्थान को नष्ट कर खेतों में बदल दिया गया। इस सबका क्या अर्थ होगा, जब मौसम ही आपका साथ नहीं देगा, तब क्या जीवन होगा मनुष्य का? हवाओं के बीच भी रहना मुश्किल हो जाए और पीने का पानी भी नसीब न हो।
पेड़ों को काटना गैर जमानती आपराधिक कृत्य में शामिल किया जाना जरूरी है। एक पेड़ के साथ कई चीजें अपने आप ही सामने आती हैं। जहां पेड़ न हों वहां मकान बनाने की अनुमति नहीं देना चाहिए। किसी समय भोपाल सघनता से हरा-भरा था लेकिन आज उसकी हरियाली पर संकट है। चीखते सब हैं पर वास्तविक धरातल पर कोई सामने नहीं आता। हर मकान के साथ कुछ पेड़ लगाने का नियम अनिवार्य होना चाहिए। जिस किसी खेत में पेड़ हों उस किसान को बैंक ऋणों के मिलने में आसानी होना चाहिए। इस तरह के प्रयासों के अलावा हमें जंगलों की सुरक्षा के उपाय भी करने होंगे। जंगल बचेगा तभी तो हमारे लिए ऐसा मौसम बचेगा जो मनुष्य को पर्यावरणीय संकटों से बचाएगा।
हमारी सरकारों का रवैया घोषणाओं का अधिक होता है। वे सिर्फ घोषणाएं करती हैं और धरातल पर क्या हो रहा है कितना अमल हो रहा है उसे देखने की किसी को फुरसत नहीं है। बीते वर्षों में लाखों वृक्ष रोपे गए, लेकिन वे कहां हैं? उनका रख रखाव नहीं होता। उनकी देखभाल नहीं होती। उनको समय पर पानी नहीं मिलता। अप्रशिक्षित लोगों के हाथों में पौधरोपण सौंप कर हम जिम्मेदारी पूरी समझ लेते हैं। अब पर्यावरण एक व्यापक समस्या बन चुकी है तो समाज के अन्य लोगों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। हमें अपने परिवेश में पेड़ों, जंगलों, नदियों की वैसी ही देखभाल करना होगी जैसी हम अपने बच्चों की करते हैं।
पर्यावरण के लिए मेरी चिंता एक डर में बदल गई है। मैं अक्सर आते जाते पेड़ों को देखती हूं और सोचती हूं कि कहीं यह पेड़ कल न दिखा तो। कहीं यह कट गया तो... कब यह दिखना बंद हो जाएगा, पता नहीं...। मुझे आशा है कि जल्दी ही हम अपने परिवेश और पर्यावरण के बीच जंगलों को इस डर से मुक्त कर लेंगे और धरती फिर हरियाली से भर जाएगी।

1 टिप्पणी:

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