सोमवार, फ़रवरी 11, 2013

खिलवाड़

 
आखिर ये करीबी ही हैं !

बहुत बड़ा सवाल ये है कि दुराचार, रेप और हत्या के कई मामलों में करीबी और परिचित भी सामने आ रहे हैं। पिछले दिनों की घटनाएं इसकी गवाह हैं। आखिर ऐसा क्यों?

दे श में होने वाले दुराचारों की घटनाओं से जन मानस आहत हो चुका है।  दो तीन दिन पहले भोपाल में एक बच्ची के साथ जो कुछ हो चुका है, वह घटनाक्रम  इस समस्या के नियंत्रण से बाहर होने जैसी स्थिति का आभास करा रहा है। स्थितियां लगातार आपराधिक बनी हुई हैं। सड़क से लेकर सियासत तक और संसद से लेकर सभ्यता तक पूरा देश मानसिक प्रताड़ना से गुजर रहा है। दुराचार रोकने की नई-नई तरकीबें सुझाई जा रही हैं। पूरे दृश्य में सबसे भयावह और काला पक्ष ये इन मामलों में परिचितों, रिश्तेदारों, शिक्षकों का शामिल होना। वासना का ऐसा आपराधिक विस्फोट का सिलसिला चल निकला है जिसमें सारे रिश्ते छिन्न भिन्न हो चुके हैं। विश्वास जैसे शब्दों के अर्थ तक अब अपने लिए छांव तलाश रहे हैं।
सवाल ये है कि आखिर देश में यह सब क्यों हो रहा है? कौन है समाज के इस वातावरण का जिम्मेदार? समाज शास्त्री कहते हैं कि समाज में घटने वाली हर घटना के पीछे कुछ कारण होते हैं। ये क्या कारण हैं? आखिर कब तक चलेगा यह अमानवीय सिलसिला? इस सवाल का जवाब व्यवस्था के साथ-साथ समाज, संस्कार, राजनीति और शिक्षा पद्धति आदि सभी को देना है। मनोवैज्ञानिक अभी तक इन सवालों का जवाब नहीं दे सके हैं। लेकिन इस गुत्थी से उन्होंने हार नहीं मानी है। वो मानव मस्तिष्क में उठनेवाली तरंगों की मैपिंग से इन्हें हल करने के सूत्र खोज रहे हैं। जानवरों के अध्ययन से उन्होंने कई सूत्र ढूंढ निकाले हैं। आदिवासियों के बर्ताव के विश्लेषण से तो उन्हें काफी सूत्र मिल चुके भी हैं। इतना जÞरूर है कि इनसे हमें खुद को समझने में मदद मिल सकती है जो इंसान को वहशीपन से बाहर निकालने का छोटा ही सही, मगर महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। हमारी सांस्कृतिक विरासत और सभ्यता अधिनायकवादी मानसकिता का यह बेहद क्रूर प्रदर्शन जैस प्रारंभ हो चुका है। आदि काल से स्त्री का शोषण भिन्न-भिन्न तरीकों से होता रहा है। दुर्भाग्य है कि आज भी महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा को इस नाम पर जायज ठहराने की कोशिश की जाती है कि  वे अपनी सीमा लांघ रही हैं। पुरुषवादी समाज ने सदैव अपने पापों के लिए बेटियों को ही जिम्मेदार माना है। औरत हमेशा ही समाज का निशाना रही है। प्राचीन काल से आज तक न जाने कितनी सदियां बीत गई, कितनी सभ्यताओं ने अपने चेहरे बदले लेकिन समाज में मूल्यों का संकट आज भी जारी है। नए मूल्यों के निर्माण की परिस्थितियां हमने जैसे समाज से दूर कर दी हैं। समाज में चरित्र निर्माण की भारी कमी है। महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहार को लड़के यानी पुरुष न तो घर में देखते हैं और न बाहर। यह बहुत आम है कि घर में पत्नी की मामूली सी बात पर पति उसकी पिटाई कर सकता है। उसके साथ गाली-गलौज या अमर्यादित व्यवहार करता है। पारिवारिक स्तर पर भी कुछ दायित्व बोध और नैतिकता को जागृत करने की आवश्यकता है। सामाजिक परिवेश भी इसके लिए जिम्मेदार है। लेकिन नैतिकता का मसला सिर्फ इंसान की बायो-लॉजिकल संरचना का ही मामला नहीं है। सामाजिक तानेबाने के साथ इसका गहरा रिश्ता है।

योजनाएं खाते भ्रष्टाचारी

भ्रष्टाचार है तो निश्चय ही इसकी जड़ भी होगी। हम भ्रष्टाचार के मामले में 4 सबसे भ्रष्ट देशों में शामिल हैं। आखिर इस बुराई के कारण क्या हैं?



हाल ही में मध्यप्रदेश लोकायुक्त पुलिस ने बिजली और वन विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों के यहां कई करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की है। यह संपत्ति आय के अनुपात में कई गुना अधिक है। भ्रष्टाचार के इस जंगल में ये एक दो ही बरगद हैं। कई और मोटे तनों की अनंत संख्या फैली बिखरी है। आज भ्रष्टाचार गाजरघास की तरह एक समस्या बन चुका है। यह ऐसी समस्या है जो बेआवाज देश में फैल रही है और विकास योजनाओं को चौपट कर रही है। भारत में अनेक समस्याएं हैं। बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा, अपराध लेकिन उन सबमें सबसे ज्यादा यदि कोई देश के विकास को बाधित कर रहा है तो वह है भ्रष्टाचार।
वास्तव में यह स्थिति एक दिन में ही नहीं बनी है। भारत के अंग्रेजी दासता से मुक्ति मिलने के मूल में भी इसके कुछ विष बीज पड़े थे। वर्तमान स्थिति में दृष्टि डालें तो काफी भयावह मंजर सामने आता है। भ्रष्टाचार ने पूरे राष्ट्र को अपने आगोश में ले लिया है। वास्तव में भ्रष्टाचार के लिए आज सारा तंत्र जिम्मेदार है। भ्रष्टाचार में सिर्फ शासकीय कार्यालयों में लेने देनेवाले घूस को ही शामिल नहीं किया जा सकता बल्कि इसके अंदर वह सारा आचरण शामिल होता है। बीबीसी के एक सर्वेक्षण के मुताबिक विश्व में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय भ्रष्टाचार है। इसके बाद दुनिया के अलग-अलग देशों में जिन विषयों की चर्चा होती है, वे हैं- जलवायु परिवर्तन, गरीबी-भूख, फिर बेरोजगारी और इसके बाद खाद्य पदार्थों एवं ऊर्जा की बढ़ती कीमतें।
2010 -11 में किए गए ग्लोबस्कैन के सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में सबसे अधिक बात भ्रष्टाचार के मुद्दे पर होती है और पाकिस्तान में आतंकवाद पर। इसी सर्वे में यह भी खुलासा हुआ है कि भारत में 66 प्रतिशत लोग भ्रष्टाचार को बहुत गंभीर समस्या मानते हैं। भारत में 30 प्रतिशत लोगों का कहना था कि लोग आम तौर पर सबसे अधिक भ्रष्टाचार के बारे में बात   करते हैं। जबकि वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के ग्लोबल कंपीटीटिवनेस इंडेक्स-2010 के मुताबिक अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्द्धा बनी रहे इसलिए व्यापार, कारोबार, राजकोषीय और सरकारी खर्च में खुलेपन के साथ-साथ भ्रष्टाचार से मुक्त माहौल जरूरी है। भ्रष्टाचार भारत की विकास की रफ्तार को प्रभावित कर रहा है। सराकरी भ्रष्टाचार उसकी योजनाओं में ही निहित होता है। परियोजनाओं के लिए प्रशासन से अनुमति लेने के दौरान बड़े पैमाने पर रिश्वतखोरी होती है। चाहे जंगल की बात हो या बिजली पानी या पर्यावरण अनापत्ति प्रमाण पत्र यहां भ्रष्टाचार पनपता है। आज लोगों का मानना है कि आने वाले कानूनों के बावजूद भ्रष्टाचार बना रहेगा। सूचना के अधिकार के लोकायुक्त, केंद्रीय सतर्कता आयोग, प्रस्तावित राष्ट्रीय भ्रष्टाचार निरोधक कानून और कॉरपोरेट गवर्नेंस के निर्देशों के बाद भ्रष्टाचार कम नहीं हो रहा है तो इसकी बड़ी वजह राजनीतिक हस्तक्षेप और न्याय में देरी भी है। 2009 के सर्वे में भारत 84वें स्थान पर था, लेकिन 2010 में यह 87वें स्थान पर आ गया। यानी भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। यह चिंता की बात है।




जांच एजेंसियों से ऐसा खिलवाड़ क्यों


सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को अनाधिकृत शब्दों के प्रयोग के लिए चेतावनी दी। फैसले से पहले आप किसी कृत्य को सुनिश्चित अपराध नहीं कह सकते, लेकिन ऐसा क्यों हुआ?

जां  च एजेंसियां देश की राजनीतिक सत्ता के बिलकुल करीब होती हैं। उनका संचालन और प्रभाव का इस्तेमाल सत्ता को मजबूत करने के लिए किया जाता रहा है। इसके कोई सबूत न मिलें लेकिन यह उनकी कार्यप्रणाली से भी समझा जा सकता है कि जांच के दायरे को प्रभावित करने और राजनीतिक फायदे के लिए एक झीनी सी सीमा भर होती है। जिसमें से इशारे देखे जा सकते हैं। हाल ही में सीबीआई और एनआईए को एक साथ आरोपों को सामना करना पड़ा है। सीबीआई को सुप्रीमकोर्ट ने मंदिर-मस्जिद ध्वंस की घटना को राष्ट्रीय अपराध कहने पर फटकार लगाई तो एनआईए पर मालवा अंचल के शख्स विनय पांडे ने आरोप लगाए हैं।  एनआईए मालेगांव, अजमेर, समझौता ब्लास्ट एवं सुनील जोशी हत्याकांड को लेकर मालवा क्षेत्र में है। कुछ संदिग्धों में से एक विनय पांडे से भी एनआईए कई बार पूछताछ कर चुकी है। विनय पांडे ने अखबारों को बताया कि एनआईए पूछताछ में उससे बाबा रामदेव, भाजपा विधायक जीतू जिराती के भी साजिश में शामिल होने व लक्ष्मण सिंह गौड़ की हत्या साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने करवाई, जैसे तथ्य जबरन लिखवाना चाहती है। इसमें और भी कई बातें शामिल हैं।
जांच के मामले अपनी परिणति में जो भी आएं, लेकिन ये आरोप यही दर्शाते हैं कि आखिर क्यों एक तरफ सुप्रीम कोर्ट सीबीआई को फटकार रहा है और दूसरी ओर एक नागरिक झूठे तथ्यों पर हामी भरने के लिए मजबूर करने की बात कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई द्वारा बाबरी मस्जिद गिराने की घटना को ‘राष्ट्रीय अपराध’ बताने पर को लिया हाथ भी लिया और कहा कि हमारे या निचली अदालत द्वारा इस तरह का या अन्य प्रकार का निर्णय सुनाये जाने तक आप इसे राष्ट्रीय अपराध नहीं कह सकते। इस मामले में उल्लेखनीय है कि सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट से ढांचा ढहाए जाने की साजिश रचने मामले में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह समेत 19 लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग की है। लेकिन इससे पहले हाईकोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ साजिश का आरोप निरस्त करने के निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई ने इसे स्वयं ही राष्ट्रीय अपराध कहते हुए हाईकोर्ट के निरस्ती के फैसले को चुनौती दी। इस तरह के शब्दों के प्रयोग करने पर कोर्ट को जांच ऐजेंसी को डांटना पड़ा। जांच एजेंसियों के कामकाज में सत्ता पक्ष पर हस्तक्षेप करने का आरोप सदन में लगाए गए। सांसद अरुण जेटली ने राज्यसभा में एक नोटिस के तहत मामला उठाते हुए सरकार पर आरोप लगाया कि पीएमओ द्वारा भेजा गया एक पत्र जताता है कि जांच एजेंसियों के कामकाज में हस्तक्षेप किया जा रहा है। हालांकि सरकार ने कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय से किसी भी केंद्रीय जांच एजेंसी को कोई निर्देश नहीं दिया गया है। वह जांच ऐजेंसियों की स्वायत्ता का सम्मान करती है। यह सही है कि राजनीतिक दृष्टिकोणों का अपना महत्व होता है लेकिन जब कभी भी वे किसी जांच एजेंसी के काम की निष्पक्षता को प्रभावित करते हैं तो इसे अच्छी स्थति नहीं कहा जा सकता।


फांसी पर कितने सवाल


फांसी आज भी विवाद पैदा करने वाली सजा है। एक तरफ मानव अधिकारों की बात करने वाले लोग हैं तो दूसरी तरफ अपराध की कठोरतम सजा के हिमायती भी हैं।

अफजल की फांसी को उदारवादियों ने आलोचना की है तो देश में कठोर सजा के हिमायतियों ने इसे सरकार का उचित कदम बताया है। मामला उदारवाद और देश में उचित सजा के बीच के प्रावधानों का हो चुका है। कोई भी देश या संप्रभु सत्ता अपने प्रति अपराध करने वाले को अपने कानूनों के अनुसार सजा देती है, लेकिन जब मानवीयता या मानव अधिकार की बात की जाती है तो मृत्यु दंड पर सवाल खड़े किये जाते हैं। देश में भी ऐसे सवाल खड़े किए जा रहे हैं। आज सवाल है कि मृत्यु दंड को जारी रखा जाए या इसे समाप्त कर उम्र कैद की सजा में बदल दिया जाए, यह भारत में बहुत ही विवाद और विचार-विमर्श वाला मुद्दा रहा है। ये मुद्दा फिर चर्चा में   है। मौत की सजा कानून के द्वारा दी जाने वाली सबसे बड़ी अंतिम सजा है लेकिन न्याय के मूल्य उद्देश्यों को देखें तो मृत्यु दंड के मामले में कई विसंगतियां हैं। सजा का मूल उद्देश्य अपराध निषेध, सामाजिक सुरक्षा तथा भय के साथ-साथ अपराधी का सुधार भी है किंतु मृत्यु दंड की स्थिति में अपराधी ही समाप्त हो जाता है तो सुधार की गुंजाइश कहां होगी? अब तक लगभग सौ देशों ने इस मामले में गंभीर विचार कर संगीन अपराध के दोषी को आजीवन कारावास की सजा को बनाए रखा है लेकिन मौत की सजा खत्म कर दी है। ब्रिटेन की संसद ने भी मृत्यु दंड को अनुचित मानते हुए वर्ष 1998 से फांसी की सजा पर रोक लगाई है। उल्लेखनीय है कि भारतीय दंड संहिता, ब्रिटिश कानून के अनुसार बनाई गई है, अतएव तर्क यह है कि जब वहां फांसी की सजा पर रोक लगा दी गई है तो भारत में भी इस सजा को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। कई विचारकों ने इस सजा का भरपूर समर्थन किया है। कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे खत्म करने के लिए लगातार अभियान चलाते रहे हैं। जे.एस. मिल मृत्यु दंड के बडेÞ समर्थक थे। उनका मानना था कि इसके बिना समाज में अराजकता फैल जाएगी। एक अमेरिकी न्यायाधीश के अनुसार, फांसी की सजा खत्म करने का अर्थ हत्यारे को एक तरह की गारंटी देना होगा कि वह चाहे जितनी भी हत्याएं करे या जैसे भी अपराध करे, उसकी जिंदगी सुरक्षित रहेगी।
भारत में फांसी की सजा ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ मामलों में ही दी जाती है। लेकिन जब भी मृत्यु दंड की बात सामने आती है तो विवाद होना स्वाभाविक है। यह विवाद तब ज्यादा उठता है, जब उसके साथ कोई राजनीतिक पहलू भी जुड़ा हो। ऐसे में, भारत में मौत की सजा बनाई रखी जाए या समाप्त कर दी जाए, यह एक जटिल मुद्दा बन जाता है। इस बहस में कई सवाल उठते हैं, जैसे कि- क्या भारत में मृत्यु दंड को समाप्त कर देना सही होगा?  मृत्यु दंड खत्म करने से आपराधिक मनोवृत्ति के लोग निर्भय तो नहीं हो जाएंगे?  क्या मृत्यु दंड मानवता के विरुद्ध है? यदि मृत्यु दंड समाप्त कर दिया जाए तो अपराध पर कैसे नियंत्रण होगा? आदि इस मामले में हमें विवेकपूर्ण नजरिया अपनाना होगा। आतंक और देश की संप्रभुता पर हमले जैसे मामलों में इसे बनाए रखने या खत्म करने से पहले हमारी अपने सामाजिक राजनीतिक स्थिति को भी देखना  होगा।

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