सोमवार, अगस्त 27, 2012

अग्रणी मध्यप्रदेश...

  विकास का अर्थ है संपूर्ण सामाजिक जीवन स्तर में सुधार हो। मध्यप्रदेश में यह हर स्तर पर संभव हुआ है। औद्योगिक विकास दर हो या बालिकाओं की शिक्षा, मप्र ने नए आयाम हासिल किए हैं।


भा रतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों के गठबंधन से बनी राज्य सरकारों का एक दिवसीय सम्मेलन नई दिल्ली में समाप्त हो गया। इस सम्मेलन को राज्यों के विकास पर केंद्रित किया गया था और इस बहाने केंद्र सरकार के रवैये को भी रेखांकित किया गया। सम्मेलन में बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, पंजाब, गोवा और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भाग लिया था।  सम्मेलन बहु उद्देशीय था। केंद्र सरकार को घेरने और आगामी चुनावी तैयारियों से पहले की मेल मिलाप वाली स्थिति थी। भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में मुख्य रूप से राज्य सरकारों द्वारा किये जा रहे नवाचार, सुशासन, बेस्ट प्रेक्टिस, केंद्र  सरकार में लंबित मामले, केंद्र सरकार द्वारा नीति निर्णय न लेने से पैदा हुई दिक्कतों और संविधान के संघात्मक ढ़ांचे के मुद्दे पर मुख्यमंत्रियों के बीच चर्चा हुई।
इस सम्मेलन में मध्यप्रदेश खास राज्य बन कर सामने आया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश के बीमारू राज्य के कलंक को धो दिया है। उनका प्रस्तुतिकरण एक तथ्य आधारित रिपोर्ट की तरह था, जिसको नकारा नहीं जा सकता था। इस बात को अन्य राज्यों ने स्वीकार भी किया। प्रदेश में हो रहे नवाचारों, योजनाओं और व्यावसायिक, औद्योगिक गतिविधियों के सुचारू संचालन ने मध्यप्रदेश को तेजी से विकास करने वाले प्रदेशों की कतार में ला दिया है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्रियों को संबोधित करते हुए पूरे देश को बताया कि मध्यप्रदेश ने विकास की नई ऊंचाइयां हासिल की हैं। इसका सबूत है कि मध्यप्रदेश राष्ट्रीय औसत से अधिक विकास दर हासिल करने वाला राज्य है। प्रदेश ने 11वीं पंचवर्षीय योजना में 10.2 प्रतिशत की दर से सकल घरेलू उत्पाद दर हासिल की है। कृषि विकास दर 9 प्रतिशत तक रही। यह वास्तव में उल्लेखनीय है। सामाजिक मामलों में भी प्रदेश ने लोककल्याणकारी राज्य का कत्तर्व्य हासिल किया है। इसमें महिला सशक्तिकरण, जन स्वास्य सेवाएं, सड़कों का फैलता जाल, बिजली उत्पादन में बढ़ोत्तरी, हर क्षेत्र में मध्यप्रदेश राष्टÑीय औसत से आगे ही रहा। मध्यप्रदेश ने वित्तीय प्रबंधन में भी नए आयाम जोड़े हैं। राजस्व कर जो पिछले पांच साल में अन्य राज्यों से कम रहा करता था वह अब बढ़कर 8.42 प्रतिशत हो गया है।  वर्ष 2005-06 से राज्य का बजट आय से ज्यादा ही रहा। इस सम्मेलन में महिला सशक्तिकरण, लाड़ली लक्ष्मी योजना, बेटी बचाओ अभियान, मुख्यमंत्री मजदूर सुरक्षा योजना, गैर संगठित श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजना, बीमा योजना, अटल बाल आरोग्य एवं पोषण मिशन, मुख्यमंत्री बाल हृदय रोग उपचार योजना, कृषि कैबिनेट का गठन और कृषि को लाभ का धंधा बनाने, पीपीपी माध्यम से सड़कों का विकास और मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना के बारे में विस्तार से मुख्यमंत्री ने बताया। विकास का अर्थ है मानवीय जीवन को नई ऊ ंचाइयां देना। मध्यप्रदेश इसमें अग्रणी है।

बेनी के बयान

कोई अपने काम के लिए जाना जाता है तो कोई अपने बयानों के लिए। राजनीतिक पार्टी और विचारधारा का नेतृत्व करते हुए नेताओं को असंतुलित अतिकथनों से बचना चाहिए।

विवादस्पद बयानों को लेकर हमेशा से चर्चा में रहने वाले केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने एक बार फिर अपने ही अंदाज में बयान दिया। उन्होंने कहा कि बढ़ती महंगाई से आम आदमी भले ही परेशान हो मगर मैं इस महंगाई से बहुत खुश हूं। एक प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए मंत्री महोदय ने स्वनिर्मित तथ्यों के आधार पर घोषणा कर दी कि वे महंगाई से खुश हैं क्योंकि इससे किसानों को बहुत फायदा होता है।  दाल, चावल, गेहूं, सब्जी आदि के दाम बढ़ेंगे तो किसानों की फायदा मिलेगा। यह बयान जब सार्वजनिक हुआ तो लोगों ने दांतों तले ऊंगलियां दबा लीं। यह तर्क के आधार पर तो सच है कि महंगाई बढ़ने से किसानों की फसल अच्छे दामों में बिकती है। लेकिन सवाल तो ये है कि क्या यथार्थ में ऐसा ही होता है? क्या बेनी प्रसाद वर्मा को प्याज के बारे में कुछ भी याद नहीं रहा? क्या उनको यह पता नहीं है कि प्याज जब मंहगी होती है तो किसानों को नहीं बिचोलियों और एजेंटों को फायदा होता है। क्या बेनी प्रसाद जी के पास बयानों से पहले उनके अधिकारियों ने सही रिपोर्ट नहीं दी या खुद केंद्रीय मंत्री ने किसानों की फसल और उनकी आर्थिक व्यवस्थाओं का अध्ययन नहीं किया था?  ये सारे सवालों के सच मंत्री महोदय ही जानते होंगे लेकिन बयानों के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाए तो यह सच है कि बेनी प्रसाद जी को किसानों के दलालों द्वारा ठगे जाने का कोई अहसास नहीं है। केंद्रीय मंत्री के रूप में बेनी प्रसाद वर्मा जी ने जो भी कहा है उसके अनुसार सब कुछ संभव हो रहा होता तो आज भारत का किसान शहरों के मध्यवर्गीय और सरकारी कर्मचारियों से अधिक संपन्न होता। जो शहर किसानों की फसलों पर फसल काट रहे हैं आज वे किसानों के मुहताज होते और किसान देश का सबसे सम्पन्न वर्ग होता। लेकिन किसानों का दुर्भाग्य है कि देश में आज तक बिचोलियों के चंगुल से मुक्त होने की व्यवस्थाएं सरकार कारगर नहीं कर सकी है। बेनी   प्रसाद वर्मा के इस गैरजिम्मेदाराना बयान के चलते महंगाई मुद्दे पर पहले से फजीहत झेल रही यूपीए सरकार मुश्किल में पड़ गई है। यहां यह भी उल्लेख करना जरूरी है कि यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान बेनी प्रसाद वर्मा के विवादास्पद बयानों को पार्टी ने कभी गंभीरता से नहीं लिया मगर महंगाई के मुद्दे पद उनका यह बयान लोगों को समझ से परे तो है ही, यह एक केंद्रीय मंत्री के अध्ययन को भी प्रदर्शित कर रहा है।  खुद प्रधानमंत्री महंगाई को लेकर 15 अगस्त को लालकिले की प्राचीर से चिंता जता चुके हैं। उनका मानना है कि महंगाई से जनता परेशान है। उधर, बेनी का बढ़ती महंगाई पर खुश होने का बयान न केवल प्रधानमंत्री के भाषण और कांग्रेसी-यूपीए की नीतियो ंके खिलाफ है। बेनी बाबू के बयान जमीनी हकीकत से दूर हैं। किसान अपने उत्पादों को सस्ते दामों पर बेच देते हैं जिन्हें बिचौलिए आगे महंगे दाम पर बेचकर भारी मुनाफा कमाते हैं। वास्तव में फायदा बिचोलियों को होता है, किसानों को नहीं। एक राजनीतिक पार्टी ने बेनी प्रसाद को इस तरह के बेतूका बयान से बचने की सलाह दे दी है। उन्हें यह सही सलाह दी गई है।

Ravindra sWapNil PraJpaTi


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