बुधवार, सितंबर 14, 2011

देर से मिला न्याय प्रासांगिकता खो देता है

 
मामला राजनीतिक हो या आपराधिक न्याय में देरी
से न्याय खो जाता है।


सुप्रीम कोर्ट ने गोधरा कांड और उसके बाद भड़के दंगे और हिंसा नहीं रोकने के कथित आरोपों पर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ कोई फैसला सुनाने से इंकार कर दिया। दंगों के 9 मामलों की जांच कर रहे तीन सदस्यीय विशेष जांच दल ने अपनी जांच रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में पेश की थी। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत को ही इस मामले में फैसला दिए जाने के लिए कह दिया है कि वह नरेंद्र मोदी सहित 63 अधिकारियों के खिलाफ जांच कार्रवाई करने या नहीं करने का फैसला करे।
दस साल गुजर जाने के बाद भी अहसान जाफरी केस पर कोई फैसला नहीं हो सका है। इन दस सालों में कई लोग न्याय के लिए अर्जी लगा कर अपनी जिंदगी से चले गए। उचित न्याय के लिए वर्षों खिंचते कई केस हैं जो फैसले की मंजिल पर नहीं पहुंच सके हैं। न्याय हो और कोई भी ऐसा व्यक्ति सजा न भुगते जिसने अपराध न किया हो। न्याय की यह अवधारणा निरपराध लोगों को अनाधिकृत सजा से बचाती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मामलों को सीमाहीन समय तक खींचा जाता रहे। सुप्रीम कोर्ट ने अगर नरेंद्र मोदी व अन्य का केस मजिस्ट्रेट को वापस किया है तो न्यायालय का विवेक है। इसमें नरेंद्र मोदी और उनके समर्थकों को खुश होने की आवश्यकता नहीं है।

न्याय त्वरित हो और इस उद्देश्य के लिए न्यायालय आवश्यक सुधारों की पहल कर सकता है।


न्या य में यह देरी क्यों? यह एक बड़ा सवाल है। इन दंगों में मरने वाले लोगों के परिजन भटक रहे हैं। न्याय के लिए वैधानिक प्रक्रियाएं इतनी जटिल और पेचीदगी भरी हो गई हैं कि लोगों को न्याय भी न्याय की तरह नहीं लगता। दस साल होने के बाद भी न्याय पालिका अब तक दंगों में हिंसा के अपराध के दोषियों और भागीदारों को देश के सामने नहीं ला सकी। न्याय का एक सिद्धांत है- सौ लोग छूट जाएं पर एक भी निरपराध को सजा न हो। नरेंद्र मोदी को इस केस की जांच में दस साल हो गए हैं। उनका केस फिर दूसरे दुष्चक्र में उलझ गया है। अब फिर मजिस्ट्रेट, हाईकोर्ट की प्रक्रियाओं से गुजरेगा। तब तक शायद नरेंद्र मोदी अपने सार्वजनिक जीवन में न रहें और जाकिया  जाफरी की स्थिति अदालत में खड़े होेने लायक भी न रहे। बोफोर्स केस भी न्याय में देरी का एक उदाहरण है। लेकिन देर का मतलब है कि हम पूरी प्रक्रिया को अपनाते हैं। जल्दबाजी में न्याय के कई पक्ष छूट सकते हैं, जिससे समुचित न्याय प्राप्त नहीं होगा। न्यायालय सभी पक्षों पर विचार करता है। हालांकि मामला कोई भी हो उसमें देरी से प्रासंगिकता खो जाती है। गुजरात केस एक उदाहरण बन रहा है जिसमें देरी के कारण न्याय  खो सकता है।

न्या य के लिए समय सीमा उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि जीवन मरण से जूझ रहे व्यक्ति के लिए दवाओं का समय पर मिलना। हजारों मामलों में फैसला आते आते इतनी देर हो जाती है कि वह संबंधित व्यक्ति के लिए अप्रासांगिक हो जाता है। हमें अपनी न्यायिक प्रक्रियाओं को तेज और सक्षम बनाने के प्रयास करने चाहिए। ऐसा न हो कि यह मामला फैसला विहीन ही बंद करना पड़े।

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