सोमवार, नवंबर 22, 2010

तुमसे अलग होना और ट्रेन का गुजरना

रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति की कविताएं


तुमसे अलग होना और ट्रेन का गुजरना


तुमसे अलग होना है
दु:ख और सुख से आगे चले जाना
भाषा और चित्र से परे होना
है यूं तुमसे दूर होना

तुमसे दूर होना
है यादों की ट्रेन का धीरे धीरे जाना
पल पल दूर होना और पल पल बिखरना

खालीपन को यूं छोड़ जाना
पटरी पर दूर तक कुछ न होना
तुम्हारा जाना जैसे हवा का रुक जाना

तुम्हारी नजरों के रे’ाम पर लिखना बाय
फिर तुम्हारी याद आना- तुम्हारा जाना
’िाखर पर झंडी की तरह तार तार होना
बिखरना गिरना टूटना उड़ना तुम्हारा जाना

’ाहर से ट्रेन की तरह धीरे धीरे निकलना
अपने शहर को जाना
दिल के प्लेटफार्म की तरह खाली होना
है तुम्हारा जाना हवा को हवा से छीन लेना




कुछ समय तय करने के बाद


कुछ समय बीत जाने के बाद
बदल देना चाहिए गाड़ियों के टायर
व्यवस्थाएं और कानूनों के अक्षर

नाकारा हो जाने वाले आइने असफल हो जाएं
तोड़ देना जरूरी है ऐसे बहुत से
कुछ समय बीत जाने के बाद सब कुछ बदल देना चाहिए
रो’ानी के स्रोत और चौराहोंं की मूर्तियों के अर्थ
अपने पेन और कल्पनाओं को वहन करने वाले बिंब

एक समय तय करने के बाद
हमें अपने दोस्तों को देखना जरूरी है
अपने ही सच बोझ बनने के लिए मजबूर हो जाएं
मील के पत्थर की तरह छोड़कर आगे चलना चाहिए

जिंदगी उजास है मटमैला पसंद नहीं करती
सुबह की हवा है बासापन स्वीकार्य नहीं

पुराने शार्पनर और खाली रिफिल की तरह
कुछ भी बेमतलब पड़ा हो
जरूरी है हमारी टेबल पर बेमतलब कुछ न रहे

महानतम होने का अहसास भी फेंक देना जरूरी है
जब वह हमें कहने में असमर्थ हो जाए....



सौंदर्य से परे एक लड़की

मैंने कविता लिखने के लिए लड़की की कल्पना की
उसे सुबह-सुबह सोते से जगाया - एक फूल दिया

कहा सुबह देखो कितनी नई है
वह मुस्कुरा उठी और अलसाए चेहरे पर दोनों हाथ फेर लिए
उसके बाल सुनहरी आभा लिए नर्म धूप से गुथे थे
वि’व कवियों द्वारा सुबह की प्रंशसाओं में कहे
काव्य-वाक्यों के जाल की तरह चमक रहे थे


खिड़की के प्रका’ा में सोने की कलाकृति बनी
चादर पर हल्की सिल्की सलवटों में खूबसूरत
उसके भाव सुदूर निर्जन प्रदे’ा में अकेली बहती नदी के
कुनकुने पानी की तरह कोमल और नर्म हैं


उसकी चमकती मुस्कुराती आंखों में
पृथ्वी के तमाम कोनों में होने वाली सुबह की सरलता है
उसके मुड़े पैर सुर्योदय में नदी के मोड़ जैसे
लड़की मेरी सुंदरता की तमाम कल्पनाओं को
अपनी सुनहरी आभा में मिलाती जा रही है

मेरे बहुत से ’शब्द उसकी सुन्दरता की अभिव्यक्ति में गल गए
मैंने उसे पृथ्वी की बहुत सी सुबहों से बनी संुदरता कहा

मुझे संुदरता की अभिव्यक्ति के लिए
बहुत अधिक shब्द नहीं कहना पड़े
वह जल्दी ही एक सुबह के सौंदर्य से होती हुई
दुनिया के सारे ’ाब्दों में समा गई

......

पक्षी बिजली का तार और एक पेड़

कुछ चीजें बदलती हैं
कुछ चीजें कभी ’िाकायत नहीं करतीं

जब पेड़ था तो पक्षी उसके दोस्त थे
एक दिन पेड़ न जाने कहां चला गया
वहां बिजली के तार आ गए

मैं जब भी फोटो खींचता हूं
चाहता हूं पक्षी शाखों पर मिलें
न जाने क्यों मैं प्रकृति के दृ’य में
बिजली के तारों से बचता हूं

मेरे कैमरे में भी कुछ तार हैं
आखिर दुनिया के फ्रेम में बिजली के तार आ ही जाते है।

3 टिप्‍पणियां:

नया सवेरा ने कहा…

... bahut sundar !!!

कुँअर रवीन्द्र ने कहा…

तुमसे दूर होना
है यादों की ट्रेन का धीरे धीरे जाना
पल पल दूर होना और पल पल बिखरना
achhee lagee ye lain

प्रदीप मिश्र ने कहा…

रविन्द्र भाई अरसे बाद मुलाकात हुई। बहादुर के एक मेल में तुम्हारे ब्लाग का पता मिला। कविताएं अच्छी हैं। कहानी का इन्तजार है।